ये निखिल सचान का रफ़ रजिस्टर है....इसमें उस वक़्त की कविताएँ हैं, जब मुझे लिखने का ख़ास सलीका नहीं था और आज की बातें है, जब आज भी मैं सलीका सीख ही रहा हूँ ! काश ता-उम्र सीखता रहूँ और इसी शौक़ में ज़िंदगी गुज़र जाए
Monday, 9 March 2026
मुझे पसंद थी वो लड़की
मुझे पसंद थी वो लड़की,
जो तोहफ़े में गुलाब और झुमके नहीं मांगती थी
वो खुद खरीद लाती थी जेब वाली जींस
और कैनवास के जूते
जूते उसके लिए क्रांति का बिगुल थे,
उन मर्दों के खिलाफ
जिन्होंने औरतों के लिए बनाई
ऊँची हील वाली सैंडिलें,
ताकि वो लंगड़ाते हुए कहीं वक़्त पर न पहुँच सकें
और भाग भी न पाएँ, कभी घर छोड़कर
मुझे पसंद थी वो लड़की,
जिसने जेब वाली जीन्स पहनकर
उन मर्दों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूका
जिन्होंने महिलाओं के लिए बनाई
बिना जेब की उलझी हुई साड़ियाँ और सलवारें
ताकि वो भूलती-खोजती फिरें
चाबियाँ, फोन और लिपस्टिक,
और मर्द ठहाके लेकर उन्हें कह सकें
भुलक्कड़ और लेट लतीफ़
मुझे पसंद थी वो लड़की,
जो इतनी मासूम थी,
कि बस जूते और जींस पहन कर
वो ऐसी क्रांति का ख़्वाब देखती थी
जो हम मर्द - बंदूक और बारूद से
हज़ारों साल में नहीं कर पाए
Sunday, 22 February 2026
हाथ थाम लेना
तो इल्म हुआ, किसी ने पहली दफ़ा,
हाथ थाम लिया है
और समझ आया
कि हाथ पकड़ने से,
कितना अलग होता है
हाथ थाम लेना
हाथ थाम लेने से
थम जाती है इस दुनिया को ज़िंदा फूँक देने की इच्छा
थम जाती है इस सिरफिरे दिमाग की बड़बड़
थम जाता है तमाशा, इर्द-गिर्द का
थम जाती है इस दुनिया को ज़िंदा फूँक देने की इच्छा
थम जाती है इस सिरफिरे दिमाग की बड़बड़
थम जाता है तमाशा, इर्द-गिर्द का
हाथ थाम लेने से
थम जाती है अपनी धुरी पर नाचती पृथ्वी
थम जाता है वक़्त, साँस, धड़कन
थम जाती है ख़ुद से, ख़ुद की लड़ाई
और न जाने कितने विश्व युद्ध
हाथ थाम लेने से,
थम जाता है इतना कुछ
थम जाता है इतना कुछ
कि महज़ हाथ थाम कर,
इस पागल दुनिया को
बचाया जा सकता है
इस पागल दुनिया को
बचाया जा सकता है
और पागल होने से
Saturday, 3 January 2026
वो सहमा हुआ सा लड़का,
वो सहमा हुआ सा लड़का, जो आज काँच के दफ़्तर में,
दबे सुर में “यस सर, जी सर” मिमियाता रहता है,
एक वक़्त था जब वो आधी दुनिया को
दबे सुर में “यस सर, जी सर” मिमियाता रहता है,
एक वक़्त था जब वो आधी दुनिया को
जूते की नोक पर रखता था।
वो सहमा हुआ सा लड़का जो आज
घर से दफ़्तर के अलावा, कहीं और नहीं जाता
एक वक़्त था जब वो ऊँची साइकिल पर सवार होकर
एक साँस में नाप लेता था पूरी धरती
और दूसरी में नाप लेता था सारा आकाश।
वो सहमा हुआ सा लड़का जो आज
बस सर झुकाकर लैपटॉप में नज़रें गड़ाए रहता है
एक वक़्त था जब वो नज़र उठाकर, घूरकर,
अपने अंगूठे और उँगली के बीच
सौ-सौ सूरज बुझा देता था।
वो सहमा हुआ सा लड़का,
जिसके सभी ख़्वाब, सूख कर
आँख में काई की तरह जम चुके हैं
एक वक़्त था जब दर्जन भर ख़्वाबों से
उसकी आँखें पिचोला झील की तरह चमकती थीं।
मैं मरने से पहले, बस देखना चाहता हूँ ये मंज़र
कि वो सहमा हुआ सा लड़का,
दुनिया को जूते की नोक पर रखने वाले उस बच्चे से,
गले मिलकर, लिपटकर,
छक कर रो ले
और फिर दोनों मिलकर, राख कर दें
इस काँच के मनहूस दफ़्तर को
जहाँ वो बस मिमियाता रहता है
यस सर, जी सर, यस सर।
यस सर, जी सर, यस सर।
वो सहमा हुआ सा लड़का जो आज
घर से दफ़्तर के अलावा, कहीं और नहीं जाता
एक वक़्त था जब वो ऊँची साइकिल पर सवार होकर
एक साँस में नाप लेता था पूरी धरती
और दूसरी में नाप लेता था सारा आकाश।
वो सहमा हुआ सा लड़का जो आज
बस सर झुकाकर लैपटॉप में नज़रें गड़ाए रहता है
एक वक़्त था जब वो नज़र उठाकर, घूरकर,
अपने अंगूठे और उँगली के बीच
सौ-सौ सूरज बुझा देता था।
वो सहमा हुआ सा लड़का,
जिसके सभी ख़्वाब, सूख कर
आँख में काई की तरह जम चुके हैं
एक वक़्त था जब दर्जन भर ख़्वाबों से
उसकी आँखें पिचोला झील की तरह चमकती थीं।
मैं मरने से पहले, बस देखना चाहता हूँ ये मंज़र
कि वो सहमा हुआ सा लड़का,
दुनिया को जूते की नोक पर रखने वाले उस बच्चे से,
गले मिलकर, लिपटकर,
छक कर रो ले
और फिर दोनों मिलकर, राख कर दें
इस काँच के मनहूस दफ़्तर को
जहाँ वो बस मिमियाता रहता है
यस सर, जी सर, यस सर।
यस सर, जी सर, यस सर।
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