Saturday, 28 March 2026

घर



गाँव का सुकून-घर छोड़कर
मैं छोटे शहर में, किराए के तंग-घर में रहा,
ताकि एक दिन बड़े शहर में
एक बड़ा महल-घर बना सकूँ।

महल-घर बना, लेकिन मैं वहाँ बमुश्किल रह पाया,
क्योंकि उसे बनाने की फ़िक्र में,
दफ़्तर मेरा घर बन चुका था।

पूरी ज़िंदगी दफ़्तर-घर में 
सज़ा काटने के बाद
मैं एकदिन थककर, 
अपने गाँव के सुकून-घर लौट आया,
बस चैन से मर जाने के लिए।

बेवक़ूफ़ इंसान, 
कितने घर बदलता है,
वापस अपने पहले घर में लौट आने के लिए।

Sunday, 22 March 2026

मैं एक दिन चला जाऊँगा.

 मैं एक दिन चला जाऊँगा. 

और जब मुझे सारी दुनिया में मुझे 

ढूँढकर थक जाओगी तुम 

तब मुझे ढूँढना तुम, 

मेरी पुरानी कविताओं में. 

 

उसके शब्दों में नहीं, 

उसके अर्थ में भी नहीं.


मैं मिलूँगा तुम्हें,  

कविता जहाँ ख़त्म हो रही होगी, 

ठीक उसके बाद वाले लंबे मौन में.

 

मौन, जो बिजली के तरह तुम्हें झिंझोड़ देगा 

और फिर मैं लहलहा कर उठ खड़ा हूँगा  

तुम्हारे रोम-रोम में 

बारिश के बाद खिली फसल की तरह 


प्रेम में पड़े लोग



प्रेम में पड़े लोग

उन चीटियों जैसे होते हैं
जो ख़ुद से हज़ार गुना भारी बोझ
सिर पर ढोती फिरती हैं

और अनजाने ही, आ जाती हैं
किसी न किसी के, पाँव के नीचे

प्रेम में पड़े लोग उन चीटियों जैसे होते हैं
जो मिठास की खोज में
ज़िंदगी भर एक क़तार में चलती रहती हैं

पूरी ज़िंदगी, बस एक घर बसाने के लिए
वो शक्कर के दाने जोड़ते रहते हैं

लेकिन घर बसने के पहले ही
मसल दिए जाते हैं, प्रेम में पड़े लोग

इन पागल चीटियों की ही तरह

Monday, 9 March 2026

मुझे पसंद थी वो लड़की


मुझे पसंद थी वो लड़की,
जो तोहफ़े में गुलाब और झुमके नहीं मांगती थी
वो खुद खरीद लाती थी जेब वाली जींस
और कैनवास के जूते

जूते उसके लिए क्रांति का बिगुल थे,
उन मर्दों के खिलाफ
जिन्होंने औरतों के लिए बनाई
ऊँची हील वाली सैंडिलें,
ताकि वो लंगड़ाते हुए कहीं वक़्त पर न पहुँच सकें
और भाग भी न पाएँ, कभी घर छोड़कर

मुझे पसंद थी वो लड़की,
जिसने जेब वाली जीन्स पहनकर
उन मर्दों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूका
जिन्होंने महिलाओं के लिए बनाई
बिना जेब की उलझी हुई साड़ियाँ और सलवारें
ताकि वो भूलती-खोजती फिरें
चाबियाँ, फोन और लिपस्टिक,
और मर्द ठहाके लेकर उन्हें कह सकें
भुलक्कड़ और लेट लतीफ़

मुझे पसंद थी वो लड़की,
जो इतनी मासूम थी,
कि बस जूते और जींस पहन कर
वो ऐसी क्रांति का ख़्वाब देखती थी
जो हम मर्द - बंदूक और बारूद से
हज़ारों साल में नहीं कर पाए