चींटियों का घर तोड़ा जा सकता है,
लेकिन घर बनाने की उनकी ज़िद
नहीं तोड़ी जा सकती।
चींटियों की ज़िद डायनासोर से भी बड़ी होती है
इसलिए भारी भरकम डायनासोर तो
विलुप्त हो जाते हैं
लेकिन अपनी ज़िद के चलते
कभी विलुप्त नहीं होतीं
नन्ही चींटियाँ
ये निखिल सचान का रफ़ रजिस्टर है....इसमें उस वक़्त की कविताएँ हैं, जब मुझे लिखने का ख़ास सलीका नहीं था और आज की बातें है, जब आज भी मैं सलीका सीख ही रहा हूँ ! काश ता-उम्र सीखता रहूँ और इसी शौक़ में ज़िंदगी गुज़र जाए
चींटियों का घर तोड़ा जा सकता है,
लेकिन घर बनाने की उनकी ज़िद
नहीं तोड़ी जा सकती।
चींटियों की ज़िद डायनासोर से भी बड़ी होती है
इसलिए भारी भरकम डायनासोर तो
विलुप्त हो जाते हैं
लेकिन अपनी ज़िद के चलते
कभी विलुप्त नहीं होतीं
नन्ही चींटियाँ
ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या?
जिसके जाने पे मुझसे पूछती है चार दीवारें
कोई घर था, नहीं था, इस मकान में क्या?
कि पूरी उम्र बाकी है, मुसलसल काटनी होगी
ख़त्म होगा - नहीं होगा, इम्तिहान ये क्या?
ज़मीं पर तो बहुत ढूंढा, कहीं दिखती नहीं हो तुम
कि अब मैं चीर के देखूँ, आसमान ये क्या!
मुझे लगता था, तेरे बिन मैं जीना सीख जाऊँगा
मेरे जीते जी टूटेगा, मेरा गुमान ये क्या ?
तेरे बारे में दिन भर बड़बड़ाता हूँ मैं बक-बक
कि अब मैं काट के रख दूँ, ज़बान ये क्या?
मैं एक दिन चला जाऊँगा.
और जब मुझे सारी दुनिया में मुझे
ढूँढकर थक जाओगी तुम
तब मुझे ढूँढना तुम,
मेरी पुरानी कविताओं में.
उसके शब्दों में नहीं,
उसके अर्थ में भी नहीं.
मैं मिलूँगा तुम्हें,
कविता जहाँ ख़त्म हो रही होगी,
ठीक उसके बाद वाले लंबे मौन में.
मौन, जो बिजली के तरह तुम्हें झिंझोड़ देगा
और फिर मैं लहलहा कर उठ खड़ा हूँगा
तुम्हारे रोम-रोम में
बारिश के बाद खिली फसल की तरह
टूट कर किए गए प्यार की।
वैसे तो दुनिया मे तमाम त्रासदियाँ हुईं
न जाने कितनी ही स्पीशीज़ लुप्त हो गईं
कितने ही युद्ध लड़े गए
मुगल, मंगोल आए, और सब कछ रौंद कर चले भी गए
लेकिन मेरे जीवन में सबसे बड़ी त्रासदी तब हुई,
जब मुझे इल्म हुआ कि मैं और तुम सयाने हो गए !!
जब हमने ये जान लिया कि किताबों मे दबाकर रखे गए
गौरैया के टूटे, लंगड़े पंखों से
एक दिन नई गौरैया नही निकल आती
जब हमने जाना कि आँख से टूटी पलक की काली कतरन
हथेली पर रखके, छाती भरकर, फूक देने से
हम तुम हमेशा के लिए एक दूसरे के नही हो जाएँगे
हमने जाना कि भूख इंसान से पहले
उसके भीतर प्यार का एक एक कतरा मार देती है
इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि एक दिन तुम सयानी हो गई
और तुम्हारी देखा देखी, मैं भी हो गया सयाना
हमें जादू-वादू बेमानी लगने लगा
और हम सपने देखने से पहली, हर बार कहने लगे -
"ऐसा सचमुच मे कहाँ होता है यार"
एक वक्त था जब तुम रोज़ाना, शिमला भाग कर
वहां किसी खाई में बस जाने का मास्टर प्लान बनाती थी
और मैं उसके लिए जोड़ता था पचास के सीले हुए नोट
जब मैं रात-रात जाग कर लिखता था तुम्हारे लिए कविताएं
और एक छोटा सा कमरा, हमें चार बेडरूम किचेन के
आलीशान घरों से कई गुना बड़ा लगता था
जब सी-व्यू-अपार्टमेंट, न तुम्हे चाहिए था न और मुझे
क्योंकि मेरे घर में थी, तुम्हारे आँखों की समूची डल झील
और तुम्हारे पास था मेरी बाहों भर नीला आकाश
इतिहास की किताबों मे जब इतिहासकार
दर्ज़ कर रहे होंगे सभी त्रासदियाँ
क्या कोई दर्ज़ करेगा हमारे सयाने हो जाने की त्रासदी?
क्या किसी किताब में खून से लिखेंगे ये इतिहासकार?
कि एक तूफ़ान से भी तेज बहने वाली ज़िद्दी लड़की
सिमटकर बंद हो गई, समझदारी की बौनी डिबिया मे
और दुनिया को जूते की नोक पर रखने वाला बेखौफ़ लड़का
'यस सर - यस सर' करके, बाकी की ज़िंदगी
मिमियाता रहा काँच के खौफनाक दफ्तर में !!
वो इतनी अछूत हैं कि कुआँ छू दें तो गाँव
कुएँ का पानी नहीं पीता
वो कुएँ से दूर खड़ी, मुह में आँचल दाबे
इंतज़ार करती रहती हैं
कि ऊंची जात वाले पानी भर ले जाएँ
और उनका पानी पवित्र बना रहे
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि ऊँची जात वाले
उनके गले में दांत गड़ाकर
उनका बलात्कार न कर पाएं
वो इतनी अछूत हैं कि उनकी चिता को
उनके परिवार वाले भी छू न पाए
वो इतनी अछूत हैं कि उनके शव को
उनकी माँ आखिरी बार देख भी न पाई
वो जलती रहीं रात के अँधेरे में
और सूरज की रौशनी भी छू न पाई
उनकी चिता को
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि ऊँची जात वालों ने
उन्हें छूने की तलब में
उनकी रीढ़ की हड्डी तोड़ डाली
वो इतनी अछूत हैं कि उनके गाँव में
कोई नहीं घुस सकता
न मीडिया, न कैमरा, न सत्ता
न बिना इजाज़त हवा, न पत्ता
वो इतनी अछूत हैं उनका गाँव
किले में बदल दिया गया है
और पूरी दुनिया से दिया गया है काट
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि ऊँची जात वाले
उनकी जबान काट देते हैं
वो इतनी अछूत हैं कि हमारे शहर
आज तक उनके गाँव नहीं पहुंचे
न ही पहुँची सड़क और बिजली
न ही पहुंचा विकास उनके पास
न आँख पर पट्टी वाला कानून
साथ में डेमोक्रेसी लेकर
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि भारत में
हर दिन दस दलित लड़कियों का
बलात्कार न हो सके
वो दलितों की लडकियां
यहाँ इतनी अछूत हैं
कि अपनी कटी जबान और टूटी रीढ़ की हड्डी लेकर
वो चली गईं हैं, ना उम्मीद,
सब छोड़ कर
अपना गाँव, अपना दुआर
अपना बाबुल, अपने खेत
अपनी सहेलियां, अपनी गुड़ियाँ
अपने त्यौहार, अपने झूले
अपना देश, अपना संविधान
छोड़कर, वहाँ,
जहाँ कोई उनसे
नहीं पूछेगा उनकी जात
और नहीं पूछेगा कि वो क्या लगाती हैं
अपने नाम के आगे
उन्हें स्वर्ग नहीं भोगना है
उन्हें वो नर्क भी चलेगा
जहाँ के कुँए से सब साथ पानी भर सकें