ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या?
जिसके जाने पे मुझसे पूछती है चार दीवारें
कोई घर था, नहीं था, इस मकान में क्या?
कि पूरी उम्र बाकी है, मुसलसल काटनी होगी
ख़त्म होगा - नहीं होगा, इम्तिहान ये क्या?
ज़मीं पर तो बहुत ढूंढा, कहीं दिखती नहीं हो तुम
कि अब मैं चीर के देखूँ, आसमान ये क्या!
मुझे लगता था, तेरे बिन मैं जीना सीख जाऊँगा
मेरे जीते जी टूटेगा, मेरा गुमान ये क्या ?
तेरे बारे में दिन भर बड़बड़ाता हूँ मैं बक-बक
कि अब मैं काट के रख दूँ, ज़बान ये क्या?
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