गाँव का सुकून-घर छोड़कर
मैं छोटे शहर में, किराए के तंग-घर में रहा,
ताकि एक दिन बड़े शहर में
एक बड़ा महल-घर बना सकूँ।
महल-घर बना, लेकिन मैं वहाँ बमुश्किल रह पाया,
क्योंकि उसे बनाने की फ़िक्र में,
दफ़्तर मेरा घर बन चुका था।
पूरी ज़िंदगी दफ़्तर-घर में
सज़ा काटने के बाद
मैं एकदिन थककर,
मैं एकदिन थककर,
अपने गाँव के सुकून-घर लौट आया,
बस चैन से मर जाने के लिए।
बेवक़ूफ़ इंसान,
बस चैन से मर जाने के लिए।
बेवक़ूफ़ इंसान,
कितने घर बदलता है,
वापस अपने पहले घर में लौट आने के लिए।
वापस अपने पहले घर में लौट आने के लिए।
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