Saturday, 28 March 2026

घर



गाँव का सुकून-घर छोड़कर
मैं छोटे शहर में, किराए के तंग-घर में रहा,
ताकि एक दिन बड़े शहर में
एक बड़ा महल-घर बना सकूँ।

महल-घर बना, लेकिन मैं वहाँ बमुश्किल रह पाया,
क्योंकि उसे बनाने की फ़िक्र में,
दफ़्तर मेरा घर बन चुका था।

पूरी ज़िंदगी दफ़्तर-घर में 
सज़ा काटने के बाद
मैं एकदिन थककर, 
अपने गाँव के सुकून-घर लौट आया,
बस चैन से मर जाने के लिए।

बेवक़ूफ़ इंसान, 
कितने घर बदलता है,
वापस अपने पहले घर में लौट आने के लिए।

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