मैं एक दिन चला जाऊँगा.
और जब मुझे सारी दुनिया में मुझे
ढूँढकर थक जाओगी तुम
तब मुझे ढूँढना तुम,
मेरी पुरानी कविताओं में.
उसके शब्दों में नहीं,
उसके अर्थ में भी नहीं.
मैं मिलूँगा तुम्हें,
कविता जहाँ ख़त्म हो रही होगी,
ठीक उसके बाद वाले लंबे मौन में.
मौन, जो बिजली के तरह तुम्हें झिंझोड़ देगा
और फिर मैं लहलहा कर उठ खड़ा हूँगा
तुम्हारे रोम-रोम में
बारिश के बाद खिली फसल की तरह
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