Thursday, 16 July 2015

विक्रम और बेताल

इश्क़ की 'नियति' जो भी हो,
कबूतर-कबूतरी का जोड़ा बने रहना
या एक रोज़ विक्रम और बेताल हो जाना
लेकिन, प्यार करना भूल चुकी,
इस नई जनरेशन के 'सिनिसिज़म' के बीच,
बासी पुरानी कहानियों से बोर होकर
तुम जब भी कभी फुर से उड़ो
तो देर सबेर लौट ज़रूर आना
और इन कांधो पे वापस अटक जाना
रहगुज़र, तुमसे
और भी बहुत सी कहानियाँ
सुननी सुनानी हैं !

Sunday, 12 July 2015

के.एल.सहगल

हम बरसात की,
किसी अलसाई दोपहर
यूँ-ही, अनायास
फिर मिलेंगे,
मैं पुराने रेडियो की तरह
तनी से कन्नी मारकर,
तुम्हें, हवा मैं तैरते
के.एल.सहगल के गाने जैसा
खोज निकालूँगा !
अनायास......

Wednesday, 8 July 2015

कमल दफतर चल

कमल दफतर चल 
नटखट मत बन
इधर उधर मत कर 
घर-दफ्तर 
दफ्तर-घर 
रह-रह 
कर-कर मर !

Thursday, 2 July 2015

अब पहले की तरह कविताएँ नहीं आतीं

अब पहले की तरह
कविताएँ नहीं आतीं

कुछ अरसा पहले
गाहे-बगाहे, बिना बताए
ज़ेहन में, यूँ ही,
कितने हक़ से चली आती थीं

जैसे बालकनी में गौरैया
पंजों पर उछलती कूदती
मुझसे पूछे बगैर, चली आती थी,
और चोंच से, सुकून से
काढती रहती थी अपने पंख

जैसे कपास का झबरा बीज
बुढ़िया के बालों सा उड़ता हुआ,
हथेली से टकरा जाता था
कुछ देर मुट्ठी में सिकुड़ कर
फिर निकल पड़ता था टकराने
किसी और की मुट्ठी से

जैसे आ जाती थी तुम्हारी याद
बारिश में भीग कर छींकने पर
और फिर तमाम-तमाम देर
लगातार आती रहती थी
छींक की तरह

जैसे दरवाजे पर आ जाता था
हाथी वाला बाबा
और दस का नोट छुआ कर
स्प्रिंग की तरह, सूंड नचाकर
सलाम करता था उसका हांथी

अब पहले की तरह
कविताएँ नहीं आतीं

लोग इन्हें, पहले की तरह
दीवानगी और शौक से
पढ़ते तो भी तो नहीं है

जैसे पहले पढ़ा करते थे
महबूब के लिखे
अंतरदेसी और पोस्टकार्ड

जैसे पहला पढ़ा करते थे
पीठ पर लिखी
किसी की उंगली की पहेली

जैसे पहले पढ़ा करते थे
बच्चों के झुण्ड
स्कूलों में इमला

जैसे पहले पढ़ा करते थे
आँखों में छिपी
जाने-कौन-सी-बात

जैसे पहले पढ़ा करते थे
चाय के दाग वाला
सनडे का अखबार

अब पहले की तरह
कविताएँ नहीं आतीं

अब, जब भी
आती हैं तो
ऐसे, जैसे,

बगल में फोड़ा
बे-मौसम का बुखार
झील में खरपतवार
दूर के मेहमान
या इम्तहान का रिज़ल्ट

कविताएँ, अब
पहले की तरह,
नींद जैसे क्यों नहीं आतीं ?
कि बस आएं और
इस दनिया से इतर
किसी और सी दुनिया में
सुकून से छोड़ आएं !

Thursday, 26 March 2015

क्लीशे

जानती हो ?
डर बस इस बात का है
कि एक दिन
सब 'क्लीशे' लगने लगता है
और, चीज़ी,
इमप्रैक्टिकल,
बचकाना हो जाता है
न मालूम क्यों, पर उन्हें
बात-बात पर, महबूबा को
"आई लव यू" कह देना
अब कूल नहीं लगता
पहले "कुछ कुछ होता है"
पर बहुत कुछ होता था
पर अब पसंद नहीं आता
लाल रंग, नाइंटीज़, गुब्बारे
चोपड़ा या करन जौहर
तुम भी तो कहती हो, कि
मुझे "बाबू" या "जानू" मत कहा करो
कितना चीज़ी लगता है !
"दफ़्तर से इतना छुट्टी मत लिया करो"
"काम ज़्यादा ज़रूरी है"
"और हम अब बच्चे नहीं रहे"
वो सब भी यही कहते हैं, कि
हर काम की एक उमर होती है
और होता है, वक्त का तकाज़ा
कि करियर और एम्बिशन
ज़्यादा ज़रूरी होता है
खुली छत पर लेटकर
सुकून से, रात भर
खुला आसमान तकने की
बचकानी सी ख्वाहिश से
कहीं ज़्यादा ज़रूरी
क्या मालूम ?
होता ही होगा शायद !
पर डर तो लगता है न !
डर !
कि एक दिन
सब 'क्लीशे' लगने लगता है
और, चीज़ी,
इमप्रैक्टिकल,
बचकाना हो जाता है

Sunday, 22 March 2015

टिक-टैक-टो

डेजा वू समझती हो ?
कल देर रात तक
आसमान में तारे
ताक रहा था
फिर आज दिखी तुम
मोगरे के सफ़ेद फूल
जूड़े में सजाए
और दिखी वो बच्ची
जो यूं ही काली स्लेट पर
खेल रही थी
कट्टम और जीरो
जैसे, जूड़े में मोगरे
या आसमान में तारे
डेजा वू !

Wednesday, 18 March 2015

मूंगफलियाँ

मैं आजकल
कहानियाँ नहीं लिख पाता
कविताएँ लिख लेता हूँ
तुम भी तो चोटी नहीं बनाती 
बस आनन-फ़ानन में
जूडा बाँध लेती हो !
इतवार अब भी आता है
पर जैसे कोई सोमवार
नाम बदल कर आया हो
गुनगुनी सी दोपहरें
तुम्हारी स्किन पर
सन-स्क्रीन देख कर
लौट जाती हैं
मूंगफलियाँ, जो इस सर्दी में
पाँव भर ही खरीदीं थीं
यूँ ही रखे हुए
आधी से ज्यादा सील गईं
जोड़ी की एक पायल
जो पिछले महीने खोई थी
न मालूम कहाँ होगी
खोजने का वक़्त भी नहीं मिला
गर जो कभी
वक्त मिला तो
दफ्तर में
बैक-टू-बैक
मीटिगों के बीच
दोनों, सोचेंगे
कि पहले
कैसे,
इतवार की हर गुनगुनी धुप में
मेरे घुटनों में सर फंसाकर
तुम घंटों मूंगफलियाँ चबाती रहती थी
और मैं, तुम्हारे बालों में तेल लगाते
कसी-मोटी चोटी बनाते
कितनी ही कहानियाँ गूँथ लेता था
और आख़िर में तुम चादर पर से
छिलके बीनते कहती थी
"ये लो ! ये पायल
यहीं तो थी
चादर के नीचे
बुद्धू !!"

Monday, 2 February 2015

प्लूटो

एक दिन
तुम भी हमसे कह देना
कि सुनो रे 'प्लूटो'
हम नहीं मानते 
ये तुम्हारा वज़ूद,
अब चलो यहाँ से फूटो !

सीसी टीवी

पिया न हमको घूरो अइसे, जैसे सीसी टीवी 
इतना मत इस्कैन करो, शर्मा जाएगी बीवी 
बड़ी-बड़ी आखें लेकर, दिन रतिया आगे-पीछे 
फोटोकॉपी करते हो क्या अखियाँ खोले-मीचे !

Sunday, 4 January 2015

ज़िन्दगी आइसपाइस

आओ न पीछे से जाकर मारें उसको धप्पा
कहें घुमाओ हमको पिठ्ठू लेकर चप्पा चप्पा
नीली वाली चिड़िया खोजे झबरा वाला पिल्ला
ढूंढें कहाँ छुपा बैठा है निरा आलसी बिल्ला
गैरज में है भूत भला क्या चलो झाँककर आएं
देखें फ़र्स्ट कौन आएगा कसकर दौड़ लगाएं
दिन भर खेलें हूल गदागद, राजा मंत्री बन लें
इन दोनों में चोर कौन है आओ बूझें चुन लें
खोजो कहाँ बड़ी वाली उंगली है इस मुट्ठी में
ख़ुशी की तरह छिपी हुई है जीवन की गुत्थी में

Saturday, 13 December 2014

सब आरज़ुएं जनानी

बाहों में दबा कर गुलाबी तकिया, सोते नहीं है
ये मर्द न जाने क्यों रातों में, रोते नहीं है ?
दिल में छुपाए फिरते हैं, सब आरज़ुएं जनानी
वही क्यों बनना चाहते हैं, जो ये, होते नहीं हैं

Friday, 21 November 2014

कोई प्यारा सा यूटोपिया !

मत सुना मेरे यार !

क्रान्ति की उबासी
बस्ती-जंगल उदासी
उन्नीस सौ चौरासी 
क्यूँ हुआ प्लासी
रियैलिटी की फांसी
फिलॉसफी की खांसी
मत सुना !

यूँ ही झूठ-मूठ
कोई प्यारा सा
यूटोपिया ही कह दे !

कह दे, कि ये बच्चे
उम्र में कभी बड़े नहीं होंगे
कह दे, कि ये पंछी
किसी बहेलिए से नहीं फंसेगे
कह दे, कि ये जुगनू
कभी अकेले नहीं पड़ेंगे
कह दे, कि ये कनेर
यूँ लावारिस नहीं सड़ेंगे

यार यूँ ही झूठ-मूठ
कह न !
कह !
कि आज भी
लोग-बाग़

क़िताबों में लाल गुलाब रखते हैं
टूटते तारों से आरज़ू करते हैं
चिट्ठियाँ-पोस्टकार्ड लिखते हैं
रातों का आसमान तकते हैं
क्लीशे वाली मुबब्बत करते हैं
बुतों के अलावा भी इबादत करते हैं
कहानियाँ सुनाओ तो सुनते हैं
मरे नहीं हैं, ये ख़्वाब बुनते हैं

तो क्या हुआ कि इनमें से
एक-एक बात झूठ है !
गप्प है !
लफ्फाज़ी है

पर फिर भी
कह दे न !

यूँ कि सुकून से
जिए हुए
बहुत दिन हुए !

Monday, 10 November 2014

Kissकी चिट्ठी आई ?

पिया हमें अपने होठों से, लिख दो छोटी चिट्ठी
पोस्ट करो हमरे गालों पर बतियाँ मिट्ठी-मिट्ठी
हाल चाल न कहना-सुनना, नाम-पता न लिखना
होठों का हो लाल लिफ़ाफ़ा, ताम-झाम न करना
तुम ही बनो डाकिया, आकर बाँछो, डाक हमारी
सबको जलने-भुनने देना, कहकर बात कँवारी
ऊँचा - ऊंचा बोल के पढ़ना, पास-पड़ोसी सुन लें
हम भी हों बदनाम, कहानी, वो भी थोड़ी बुन लें
रह जाएं हैरान, भला ये "किस" की चिट्ठी आई?
क्यूँ ये लड़की घूम रही है पगलाई - पगलाई ?

"मेड फॉर ईच अदर"

नहीं !
हम दोनों
"मेड फॉर ईच अदर"
नहीं है !
एक दूजे के लिए
प्रिंस-प्रिंसेस
परफेक्ट-फ्लॉलेस
राजा-रानी
खतम-कहानी
भी नहीं !
हम बस
सवाल-जवाब हैं
मैं एक कठिन सवाल
और तुम
एक आसान जवाब
जैसे नट का जवाब बोल्ट
मिर्च का जवाब शक्कर
साँप का जवाब बीन
मनडे का जवाब फ्राइडे
और
इक्के का जवाब
तुरुप !!

Wednesday, 29 October 2014

किराएदार

भाड़े पर आए थे सैंया, मालिक बन कर बैठ गए
हमरे दिल पे चुपके-चुपके, कब्जा कर के बैठ गए
रेंट दिया न, लिखा पढ़ी कुछ, कोई अग्रीमेंट नहीं
छोटा सा था एक बिएचके, अपना कर के बैठ गए
बालकनी थे नैनन की जो, उसको भी हथियाए हैं
दुनिया भर को तकने-झकने, अखियाँ बसके बैठ गए
बैठ गए तो ऐसे जमकर, हिलते हैं, न डुलते हैं
लम्बा चक्कर लगता है, जी, पलथी धरके बैठ गए

Saturday, 4 October 2014

आइस-पाइस

मैं खोजता हूँ तुम्हें,

जैसे एक मजदूर,
दिन भर की मेहनत के बाद
बीड़ी का बण्डल खोजता है
एक क़श में फ़कीर हो जाने के लिए
दो घड़ी अमीर हो जाने के लिए
तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम मेरे लिए महज़ पताका छाप बीड़ी हो

मैं खोजता हूँ तुम्हें,

जैसे एक किसान
महीना भर बुवाई के बाद
मूसलाधार सावन खोजता है
बूँद का एक-एक सिक्का बटोरकर
साहूकार हो जाने के लिए
तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम मेरे लिए महज़ सालाना मानसून हो

मैं खोजता हूँ तुम्हें,

जैसे एक इंजीनियर
हफ्ता भर घिसाई के बाद
फ्राइडे की बियर खोजता है
दो-एक रात को ही सही, नशे में
ख़ुद अपना बॉस हो जाने के लिए
तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम मेरे लिए महज़ किंगफिशर स्ट्रौंग हो

मैं खोजता हूँ तुम्हें

जैसे एडम और ईव
ख़ुदा से नज़र बचाकर
ईडेन का एप्पल खोजते हैं
बच्चलन हो जाने के लिए
इश्क़-हराम फ़रमाने के लिए
तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम मेरे लिए महज़ इक सेब हो

मैं खोजता हूँ तुम्हें

जैसे एक बच्चा
माँ से नज़र बचाकर
खड़िया, मट्टी, कूड़ा खोजता है
मुट्ठी भर खा लेने के लिए
माँ को यूँ ही सताने के लिए
तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम मेरे लिए महज़ मुट्ठी-भर-मिट्टी हो

मैं खोजता हूँ तुम्हें

जैसे ये मधुमक्खियाँ
चक्कर-चक्कर, दिन-भर
बाग-बगीचे-फूल खोजती हैं
शहद का वो छत्ता बनाने के लिए
जिसे कल कोई और तोड़ ले जाएगा
तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम मेरे लिए महज़ कोई-सा-भी फूल हो

तुम्हें सुनने में ‘अन-रोमैंटिक’ लगेगा
पर तुम्हें बस वैसे ही खोजता हूँ जैसे
इंसान जुराबें खोजते हैं
गंजहे अफ़ीम खोजते हैं
समंदर रेत खोजते हैं
मेंढक बरसात खोजते हैं
चूहे कपड़े-कपास खोजते हैं

कहीं, कभी, यूँ-ही
इस आइस-पाइस के
सिलसिले में
मिल जाओ न
कि मैं
खोजता हूँ
तुम्हे

इस-क़दर !

Friday, 12 September 2014

क़सम गैलीलियो की

याद है? ...

तुम्हें मैथ्स पसंद थी
लेकिन तुम्हारे खूंसठ बाप ने
तुम्हें दसवीं आते-आते
बायोलॉजी की गिरफ़्त में डाल दिया
और तुम मेंढक का पेट चीर-फाड़ कर
उसके मरे-बदबूदार-लिजलिजे शरीर को
माइक्रोस्कोप से देखती पढ़ती रही

मुझे बायोलॉजी पसंद थी
लेकिन मेरे इंजिनियर बाप ने
मुझे नवीं गुज़रते ही
गणित के पल्ले बाँध दिया
और मैं केसियो के कैलकुलेटर पे चढ़कर
सिंपल इंट्रेस्ट के कॉम्प्लेक्स सवाल
बग़ैर किसी इंट्रेस्ट हल करता रहा

आज,

दसवीं के कुछ बीस साल बाद
जब तुम अपने थुलथुल मरद की
तोंद की बायोलॉजी संभाल रही हो
और मैं अपनी टिपटॉप बीवी के
सोने के जेवरों के गणित में उलझा हूँ

तब,

"क़सम गैलीलियो की"
लाज़मी है
ये सोचना,
कि मेरे तुम्हारे
काइयाँ से दिखने वाले बाप

ग़ज़ब दूरदर्शी थे!

Thursday, 11 September 2014

हम नहीं फसेंगे

तुम आईं
बिलकुल उस शातिर
बहेलिये की तरह,

जाल पसराते हुए

मैं आया,
बिलकुल उन बुद्धू
चिरइयों की तरह

बात दोहराते हुए

"बहेलिया आएगा
बहेलिया दाना डालेगा
हम नहीं फसेंगे"

"बहेलिया आएगा
बहेलिया दाना डालेगा
हम नहीं फसेंगे"

हाय!
हमारी क़िस्मत!

तुम आईं, तुमने,
दाना भी नहीं डाला
और हम
दीवानगी की हद में
पलकों के जाल में
पाँवड़े बिछाकर

भूखे ही फँस गए!

Wednesday, 10 September 2014

रहि-मन-धागा

मेरे तुम्हारे
दरमियाँ
ये जो डोर है

उसमे 


गाँठ बन कर
ही सही

रह जाओ न !

'स्प्राउट्स'

कितनी ज़िद्दी हो!

यूं इतने हक़ से
बार-बार
दिल-ओ-दिमाग़ पर
इस तरह पनप आती हो
जैसे चने पर 'स्प्राउट्स'

'नमी' बड़ी बुरी चीज़ है!

दो-चार बूँद भी मिल जाए
तो रेगिस्तान को
गुलिस्ताँ होते
देर नहीं लगती

Monday, 8 September 2014

हारा रा जलाइ लौ

हारा रा जलाइ लौ भैया, हारा रा जलाइ लेओ
लौका-लाठी चौका-काठी मिन्टन मा जलाई देओ

पंडित जी की लुंगी जारो, वेदन को जलाई लेओ
जौनो कहे हराम मुहब्बत, आगिया मा जलाई देओ

मुल्ला की क़ितबिया जारो, ग्रंथन को जलाई लेओ
हमका तुमसे मिलने न दे, बंधन का जलाई देओ

पैसा बारो, कौड़ी जारो, बैंकों को जलाई लेओ
जौनो पूँजी जोड़ें लागे, भैन्चो को जलाई देओ

अपनी सोती अतमा जारो, थोड़ा तो जलाई लेओ
ठंडी है अंधेरी दुनिया, दीया तो जलाई देओ

दीया तो जलाई देओ भैया, हीया का जलाइ लेओ
हारा रा जलाइ लौ भैया, हारा रा जलाइ देओ

Monday, 25 August 2014

टैटू

इस सरहद पर किसने खींची, मेरे यार लकीरें
अच्छे-भले मुल्क की लिख दी, किसने ये तक़दीरें
सूनी अच्छी थी मिट्टी की कोरी सुर्ख हथेली
कैसे बूझेगी अब दुनिया इसपर लिखी पहेली
"टैटू" जैसे गुदवा दी हैं, कैसे इन्हें मिटाऊँ
किसके खून से धुलकर इसके जिद्दी दाग छुड़ाऊँ
सदियों-सदियों सहनी होगी इनपे जमी ख़राशें
बड़ा बुरा है मर्ज़ सियासत, कैसे दवा तलाशें

Saturday, 23 August 2014

ध्यान से देखो...तुम सी लगती है

वो गौरैया देख रही हो?
जो बारिश में भीग कर
रुई का गुल्ला हो गई है
और अपनी चोंच से
अपने पंखों को 
कंघी कर रही है

ध्यान से देखो
तुम सी लगती है

वो लाल रिबन बाँध कर
स्कूल जाती हुए लडकी
जो माँ से चोटी पर
गुडहल के चार फूल बनवाकर
चलती कम,
मटकती जादा है

ध्यान से देखो
तुम सी लगती है

वो पहेली याद है तुमको?
"हरी थी..मन-भरी थी.."
जिसका ज़वाब 'भुट्टा' था...
उसमें, वो सुनहरी सी लडकी,
जो, राजा जी के बाग़ में
दुशाला ओढ़े खड़ी थी

ध्यान से देखो
तुम सी लगती है

ये पुरानी फोटो भी देखो न,
जिसमे मेरी माँ
बीस बरस की है,
और कॉलेज बंक मारकर
पहली ब्लैक-एंड-व्हाईट फोटो खिचवाने
कितना सज-धज के
स्टूडियो में आई है

ध्यान से देखो
तुम सी लगती है

और ये ढाई साल की बच्ची
जो सोती है, तो
आँखे मिचकाती है
मुह बिचकाती है
और गहरी नींद में
चूस-चूस कर
अपना अंगूठा पिचकाती है

ध्यान से देखो
तुम सी लगती है

ये रात
चाँदनी
ख़ामोशी
सुबह
रौशनी
ज़िंदगी

जो भी मैं
देख पा रहा हूँ

ध्यान से देखो
तुम सी लगती है

Wednesday, 20 August 2014

यहीं हैं, बहुत दूर नहीं

यहीं हैं, बहुत दूर नहीं

वहाँ, जहाँ
स्कूल की घंटी बजी है
और प्राइमरी के बच्चे
मास्टर जी के वेस्पा स्कूटर से तेज
बिना क्लच-गियर-एक्सीलेरेटर
बेहिसाब दौड़ पड़े हैं
चूरन-बेर वाली बुढ़िया के ठेले की और

हीं हैं, बहुत दूर नहीं

वहाँ, जहाँ
पार्क की बेज़ान बेंच पर
चौकीदार से नज़र बचा कर
गोधन ने कनेली को
पहला कुंवारा चुम्बन दिया है
और कनेली के साथ-साथ
पार्क की बेंच भी जी उठी है

यहीं हैं, बहुत दूर नहीं

वहाँ, जहाँ
इन्द्रधनुष निकला है
और एक छोटे से बच्चे ने
अपनी एड़ी पर उचक कर
बादल के गुमनाम टुकड़े में
रुई के बालों के बीचों-बीच
सतरंगी "हेयरबैंड" ख़ोज निकाला है
और जी भर कर ताली बजाई है

यहीं हैं, बहुत दूर नहीं

वहाँ, जहाँ
काई के गुच्छे में फंसी
कागज़ की एक सीली सी नाव
पत्थर की ठोकर से उठी
लहर के धक्के से
बारिश में वापस तैर पड़ी है
रूठे से राजू के दरवाज़े की ओर

यहीं हैं, बहुत दूर नहीं

वहाँ, जहाँ
कल रात बिस्तर पर
पहली बार सलवटें पड़ीं
और उनकी क्रीज़ की गहराई में
पाज़ेब, बुंदे, लाज,
लत्ते-कपड़े-राज़, और
न जाने क्या-क्या हिरा गया

यहीं हैं, बहुत दूर नहीं

ज़िंदगी,
और उसके
निशाँ
यहीं हैं,
बहुत दूर नहीं

Monday, 18 August 2014

"वन-टू-हंड्रेड"

वो बच्ची हर रात
"वन-टू-हंड्रेड" 
तारे गिनती है
क्योंकि बाबा ने
उसकी उँगलियों के पोरों पर
सौ के आगे के "नंबर"
अभी तक सजाए नहीं हैं

वो रोज़ चाँद को भी गिनती है
जबकि आसमान में
ले-दे-कर बस एक ही
बोरिंग सा चाँद है

उसका अंगूठा
टब्बक-टब्बक, उछल-उछल
उँगलियों के पोरों पर
दौड़ता है तो, ये तारे
टिम-टिमा कर
"प्रेजेंट मैम" कहकर
अपनी हाज़िरी दर्ज़ करा देते हैं

मुझे फ़िक्र है कि
कि कल को वो बच्ची
बड़ी हो जाएगी
और "हंड्रेड" से आगे की
ख़तरनाक सी गिनती
स्कूल से या क़िताबों से
सीख आएगी

और तब, जब उसे
गिनने के लिए
अंगूठे से उँगलियों के पोरों को
छूने की ज़रूरत भी न होगी

उस दिन ये खेल
बोरिंग होकर
छत पर
लावारिस ही छूट जाएगा

और "मैम" को खोजता
"प्रेजेंट" सा वो तारा
बावला सा, हैरान सा
बालकनी के किसी कोने में
"एब्सेंट" ही टूट जाएगा

Tuesday, 15 July 2014

वेस्टीजियल ऑर्गन

मोहोब्बत, मेरे यार
"वेस्टीजियल ऑर्गन" है
जो है कुव्वत
तो बचा ले
इससे पहले कि, इसे
इवोल्यूशन पचा ले !

Saturday, 5 July 2014

मोहोबब्त - मोहोब्बत - टर्र - टर्र

तब जबकि, सब
इंटेलेक्चुअल्स की तरह
क्रान्ति की बातें कर रहे होंगे
हम उस वक़्त,
बेशर्मों की तरह 
मोहोब्बत की बातें जी रहे होंगे
मोहोब्बत जो जितनी इबादत होगी
उतनी ही हवस और वासना भी
हमें इंटेलेक्चुअल नहीं
मेंढक होना पसंद है
जो सावन की हर बारिश से
बेइंतहा 'ठरक' कर
अपने गाल फुला लेते हैं
और तब तक टर्राते रहते हैं
जब तक कि मेंढक मेंढकी
टर्र-टर्र की टॉर्च से
एक दुसरे को, रात के अँधेरे में
ख़ोज नहीं लेते
-
तब जबकि सब,
समाजवादियों की तरह
समाज बदल रहे होंगे
हम उस वक़्त
लिजलिजे, ठरकी, उजड्ड, अनपढ़
बेढंगे मेंढकों की तरह
शोर मचाकर टर्रा रहे होंगे
एक ऐसे सावन के इंतज़ार में
जब रात बादलों से झमाझम !!
इश्क़ की भांग बरसेगी
और दुनिया के सारे मेंढक
अपने अपने पोखर-तलाबों से निकलकर
इन क्रांतिकारियों की दुनिया को
अपनी टर्र-टर्र के शोर से
इस हद तक भर देंगे
कि उनके इंक़लाब के
हर फुसफुसे नारे के 'पतंगे' को
हमारे फूले हुए गालों से निकले
बेढंगे से शोर की 'लम्बी जीभ'
गप्प कर के खा जाएगी
मोहोब्बत मोहोब्बत - टर्र टर्र
इबादत इबादत - टर्र टर्र
इश्क़ इश्क़ टर्र - टर्र
हवस हवस टर्र टर्र

Sunday, 29 June 2014

छोटा अ से अनार

कल, जब 
एक क्रांतिकारी 
साहित्यकार ने 
ज़िंदगी भर की 
समझ निचोड़ कर 
दुनिया को 
फूंक डालने का 
निमंत्रण लिखा 

तभी, कल, उसी पहर 
एक तोतले बच्चे ने
स्लेट पर खड़िया से
छोटा अ से अनार,
बड़ा आ से आम लिखा

'र' पे बड़ा आ
'ज' में लगाके छोटा उ
'राजु' अपना नाम लिखा !!

हराम

वो सब कि जो हराम है, वो सब कि जो ख़राब है 
मेरे नसीब में तू लिख, वो सब कि जो शराब है 

ये पाक़ साफ़ जो भी है, तेरा है, तू ही रख ज़रा 
मुझे वही अता करो, लबों का जो लबाब है

माचिस

भांति-भांति के लोग भतेरे, 
भांति-भांति की ख्वाहिश 
भांति-भांति बारूद भतेरे, 
एक अकेली माचिस !

Sunday, 8 June 2014

चिरपिर

पहले यहाँ पतंगों को, कुछ बच्चे लूटा करते थे
एक कटे तो, उसके पीछे दसियों छूटा करते थे

आज पतंगे बे-वजहा बिजली खम्बों में फंसती हैं
फटी-फटी सी आँखों से न जाने किसको तकती हैं

सालों-साल टंगी रहती हैं, इतनी जिद्दी होती हैं
उस बुढ़िया के जैसे ये, कुछ कहती हैं, न रोती हैं

इसी आरज़ू में चिरपिर, करती हैं, के वो, आएगा
छुटका छुर्री देगा, तिस पर, मझला भाई उड़ाएगा

  

Thursday, 22 May 2014

सवाया

आधा-पौना मत आना
जो अबकी आना साजन

तुम जैसे हो वैसे बनकर
'पूरे' आना साजन 

Thursday, 8 May 2014

दो-सौ-बहत्तर

सुनो,
जब वो सब
पहाड़ के इस तरफ़
कुर्सी-कुर्सी जोड़ कर
सरकार बना रहे होंगे

मैं और तुम
पहाड़ के उस तरफ़
तिनका-तिनका जोड़ कर
चुपचाप
एक घोसला बना लेंगे

जब वो इधर,
जोड़-तोड़ से
चला रहे होंगें
अल्प मत की
सरकार

तब, उधर
हमारे घोसले में
पूर्ण बहुमत से
मैं तुम्हें रानी
घोषित कर दूंगा
और तुम भी, इतराकर
मान लेना मुझे
अपना यार

बेफ़िक्र करेंगे हम
वादियों में
गोताखारी
और न लौटेंगे कभी

इस पार

Wednesday, 23 April 2014

मोहोब्बत तेरी याद आई

"आज फिर, कुछ-एक मर्तबा, 
मोहोब्बत तेरी याद आई 
हर इक साँस से पहले, 
हर इक साँस के बाद आई "

Monday, 7 April 2014

खलिहान

अबकी उड़ना,
तो दाना लेकर
घोसले को
लौट आने को
मत उड़ना

ये पंछी
जाल में नहीं फसते

ये फसते हैं तो
दाने के ढेर में

दल्हानों में

Thursday, 13 March 2014

गुमशुदा की तलाश में एक इश्तिहार ...



अक्कड़-बक्कड़-बम्बे गुम, अस्सी-नब्बे-सौ भी गुम
मुझमे कहीं हुआ करता था, भोला-भाला बच्चा, गुम

अब भी यहाँ उड़ा करती हैं, आसमान में कई पतंगें
लावारिस गिर जाती हैं, लूटन वाला बच्चा गुम

देखो तो दिख जाएगा, जुगनू अब भी चमचम है 
पीछे-पीछे भगने वाला, तकने वाला, बच्चा गुम 

उस बुढ़िया की बड़बड़ में, शायद एक कहानी हो 
अब भी कुछ तो कहती है, सुनने वाला बच्चा गुम 

झिलमिल करते तारों को, जोड़-जाड़ कर देखो तो 
एक धनुष बन जाता है, गिनने वाला बच्चा गुम 

मैं भी गुम, तू भी गुम, कितने गुमसुम लगते हैं 
बिना वजह की बातों पर, हँसने वाला बच्चा गुम 

Tuesday, 11 March 2014

ककहरा

तोर ककहरा क-ख-ग-घ
मोर ककहरा साजन 
तै बांछेगा ए-बी-सी-डी
मैं भज लूँगा साजन

फस्ट क्लास तै पास भया
मैं लाया सेकेन डिवीजन 
तेरी झोली कागज़-पत्तर 
मेरी झोली साजन

Saturday, 18 January 2014

मुख़ातिब

तब जबकि हम-सब 
ख़ुदा से, 
हो रहे होंगे 
मुख़ातिब

और कोशिश में होंगे, 
सबसे ख़ूबसूरत, सुलझे 
और पाक़-साफ़ दिखने को 

तब, तुम,
सोई-सोई आँखों से 
चली आना, चुपचाप 

और मेरी गोद में 
सिर रखकर 

बेख़बर सो जाना 

मुझे यक़ीन है, 
ख़ुदा 
हम दोनों को 
बिठा लेगा, तब

अपने ताज-ओ-तख़्त पर 

और, ख़ुद
नीचे बैठकर 
पाँव पखारेगा 

कुछ मेरे
और कुछ तुम्हारे 

स्नेह से भर आई 
आखों की 
अश्रुधार से !

Monday, 30 December 2013

आधा-पौना

हद में रह के करना हो तो, इश्क़ मेरी जाँ न करिए 
यूँ आधा-पौना करना हो, तो इश्क़ मेरी जाँ न करिए 

उड़िए तो इतना उड़िए, कि आसमान से गले मिलो 
बस उस छज्जे तक उड़ना हो, तो इश्क़ मेरी जाँ न करिए 

शहसवार बन कर लड़िये, मैदान-ए-जंग में डरना क्या
जो घुटनों के बल चलना हो, तो इश्क़ मेरी जाँ न करिए

कहते हैं आग का दरिया है, ये इश्क़ नहीं आसान 'जिगर',
जो डूबे बिना उभरना हो, तो इश्क़ मेरी जाँ न करिए

आगे-आगे देख मियाँ, कुछ 'मीर तकी' से सीख ज़रा
यूँ अभी-इब्तिदा रोना है, तो इश्क़ मेरी जाँ न करिए

Saturday, 28 December 2013

मर मिटा ....

वो मरे इंक़िलाब पर 
मैं एक ग़ज़ल पे 
मर मिटा 

वो मरे, तो, अमर हुए 
मैं मर मिटने पे 
मर मिटा

Friday, 27 December 2013

ज़िक्र

उजला-उजला सूरज आकर, टिम-टिम तारे लूट गया 
छोटे-छोटे बच्चों को वो मोटा बस्ता लूट गया 

सकरी थी ये पगडंडी पर खेतों तक तो जाती थी 
कच्ची-कच्ची गलियों को वो पक्का रस्ता लूट गया 

माना थे बेकार मगर, हर रात लौट तो आते थे 
अच्छे-भले 'पिण्ड' को मेरे, मुल्क 'कनाडा' लूट गया 

मेरे कच्चे घर से चिढ़कर, वो डाकू भी लौट गया 
तिनका-तिनका जोड़ा था, इक, वर्दी वाला लूट गया 

पूरी तरह नशे में धुत, मैख़ाने का हर बंदा था 
तेरा ज़िक्र चलाकर हमको होश में आना लूट गया

बचपन के जिगरी थे दोनों, साथ निवाला खाते थे 
इन्हें 'चुनावी' मौसम में, मज़हब समझाना लूट गया  

जाने से अनजान भला, वो बूढ़ा ख़ुश तो रहता था 
बूढ़ी आँखों पर उसको, चश्मा चढ़वाना लूट गया 

Monday, 23 December 2013

गुंचा

बड़ा दिलकश था वो क़िस्सा, मगर सच्चा नहीं था 
यूँ तो मासूम था, बेहद, मगर बच्चा नहीं था 

कि इस बागीचे में था फूल, हर इक किस्म का, पर 
बला का ख़ूबसूरत था, मगर कच्चा नहीं था 

तेरी भी याद में इक 'ताज' बनवाते मगर तू
भला सूरत का था, सीरत से पर, अच्छा नहीं था 

बड़ा हल्ला था तेरे, चाँद होने का, फ़लक में 
कि फिर जो रात बीती, दिन में क्यों चर्चा नहीं था 

Tuesday, 17 December 2013

इन्शाह अल्लाह !!


आओ, फिर एक रात 
तुम,ओस की बूँद हो जाओ 
और मैं,
गुलमोहर का पत्ता
हो लूं

तुम्हें मोती सी
महफ़ूज़ भी रक्खूं
तो बस इक रात के लिए

तुम्हें पनाह भी बख्शूं
तो बस इक रात के लिए

सुबह,
तुम्हारा वजूद
हो भी शायद

और नहीं भी

शायद

ग़र, जो हो, तो
बस उस तलक
जिस तलक
मेरा वज़ूद हो - इन्शाह अल्लाह !!

Friday, 29 November 2013

कच्ची अम्बियों के पतंगे

हमने बना लिए 

पक्के मकान
सर्दी-गर्मी से महफ़ूज़ 

पक्के चेहरे 
गम-ओ-ख़ुशी से महफ़ूज़ 

पक्के इरादे 
टूटने-बिखरने से महफ़ूज़ 

पक्के देश
पड़ोसियों से महफ़ूज़ 

पक्के इंसान 
इंसानों से महफ़ूज़ 

पक्के सीने 
धडकनों से महफ़ूज़ 

पक्के दिमाग 
दिलों से महफ़ूज़ 

पक्के हाँथ 
चूड़ियों से महफ़ूज़ 

पक्के बुढ़ापे 
बचपने से महफ़ूज़ 

पक्के छज्जे 
बारिशों से महफ़ूज़ 

हमने बना लिए 
पक्के-पक्के... 

हमने... 

सब कुछ इतना 
पक्का कर लिया 
अपने आस-पास 
और अपने अन्दर 

कि कल मायूस लौट गया 
एक कारवाँ
काठ के इस, 
कठोर जंगल से 

जिसमें कुछ तितलियाँ थी 
कुछ परिंदों के नन्हें बच्चे थे 
और कुछ पतंगे, जो सिर्फ़
कच्ची अम्बियों पे मंडराते हैं