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Saturday, 7 September 2013

मोहोब्बत का स्कूल

ये तितलियाँ
ताउम्र पढ़ती रहती हैं 
फूलों की क़िताबें 

पंखुड़ियों के पन्नों में 
आँखें गड़ाए
मोहोब्बत की इबारत
बांछ्ती फिरती हैं

एक फूल से दूसरे फूल
एक स्कूल से दूसरे स्कूल

Sunday, 1 September 2013

मेरी कविता अश्लील है

मेरी कविता में,

नहीं हैं, 
फिलॉसफी 
ज्ञान, फ़लसफ़ा, दर्शन 
लम्बी-लम्बी पंक्तियाँ
आलोचकों और समीक्षकों की सीख
एब्स्ट्रैक्ट का फूलदान
मुशायरों की लॉबी
ढंग, क़ायदा, कानून
पी.एच.डी., डॉक्टरेट की थीसिस
साहित्य के रहनुमाओं की दाद
अर्ज़, शुक्रिया, इरशाद
व्याकरण, बहर, मात्रा
समाज की चिंता,
जंगल, नहर, खदान
पुरानी कविता का जनाज़ा
और नई कविता का बर्थडे केक
प्रयोगवाद, साम्यवाद, समाजवाद
एजेंडा, मसला, मतला
दावा, मुद्दा, तुर्रा

मेरी कविता 'हैंगओवर' है

क्योंकि वो गोल्ड फ्लेक,
ट्यूबौर्ग, रॉयल स्टैग, ओल्ड मौंक
तुम्हारी ख़ूबसूरती
और तुम्हारे इश्क़ के
नशे से उपजी है
गेंहू, बाजरा और जौ के सड़ने से
पकी 'शराब' की तरह

मेरी कविता अश्लील है

क्योंकि वो आज के
नाज़ुक क्रांतिकारी माहौल में भी
प्यार-मोहोब्बत की बात करती है
छाती के उभार पर ग़ज़ल कहती है
और तुम्हारे बालों के घुँघराले होने पर
सौ करोड़ की जवानी
और जिस्मो-जान छिड़कती है

मेरी कविता बत्तमीज़ है

क्योंकि वो लोगों को
अनशन करने के लिए
सड़कों पर नहीं बुलाती
आन्दोलन का बिगुल नहीं फूंकती
अलबत्ता तुम्हें ही 'ज़ाइटगीस्ट' बताती है

मेरी काविता ब्लाफेमी है, नास्तिक है

क्योंकि वो धर्म को नहीं मानती
मंदिर नहीं जाती
मस्ज़िद नहीं जाती
लोगों को धर्म-निरपेक्षता नहीं सिखाती
उल्टा, तुम्हें और सिर्फ़ तुम्हें
ख़ुदा बताती है
और इश्क़ को बतौर मज़हब
स्थापित करती है

मेरी कविता अनाथ है,

क्योंकि वो इस दुनिया के
किसी बाप के नहीं लिखी गई
बल्कि इस दुनिया के
सबसे छोटे सबसेट
'मैं' और 'तुम' के लिए लिखी गई है
और उसे पढ़ते भी
सिर्फ़ 'तुम' और 'मैं' हैं

मेरी कविता गूंगी है,

क्योंकि उसे सुनने वाले बहरे हैं
एक लम्बे राजनीतिक भाषण में
आई हुई जनता की तरह
जिन्हें 'दस' रूपए देकर
चार घंटे तशरीफ़ रखने को बुलाया है

मेरी कविता अधूरी और लम्बी है,

क्योंकि उसे ये नहीं पता
कि शुरू होने के बाद
कब ख़तम हुआ जाए
ताकि लोगों को उबकाई न आए
और वो मेरी तुम्हारी दिल्लगी को
अश्लीलता न कह दें

लेकिन,

मेरी कविता,
सच्ची है,
क्योंकि मैं
नशे में हूँ !

मेरी कविता,
सबसे सुन्दर है

क्योंकि मेरी कविता में
तुम हो !

मेरी कविता,
जिंदा है

क्योंकि
हर मरे हुए
ज्ञान, घर्म, फिलौस्फी, दर्शन, मज़हब
के इस दौर में

सिर्फ़ तुम जिंदा हो
और तुमने,
मेरी कविता में
जान फूंक दी है .....

Friday, 30 August 2013

तुरपाई

अभी तो बस इब्तदा है मियाँ,
और इश्क़ में उबकाई आती है !
कल को दिल भी छलनी होगा, 
तुम्हें 'तुरपाई' आती है ?

शराब

आखों पे पलकें, हिज़ाब करके आए
वो आँखों को कच्ची शराब करके आए 

जहाँ हर किसी को थी, पीने से तौबा 
वो पूरा मोहल्ला, ख़राब करके आए !

दस्तख़त

ख़ुदा' तुम्हें,

जब भी नकारने लगता हूँ 
तुम्हारे दस्तख़त 
इंगे-उंगे, नज़र आ ही जाते हैं 

अभी कल ही की बात है, 
जब उस प्यारी सी, 
बच्ची के गाल पर, मैंने 
तुम्हारा सुरमई दस्तख़त देखा 

यहाँ, ज़मीं पर, 
कुछ लोग उसे 
'तिल' भी कह देते हैं !!

बीच वाली उँगली

मैं बचपने में हर खेल में फिसड्डी हुआ करता था. लेकिन एक खेल ऐसा था जिसमें कोई भी मुझसे पार नहीं पा सकता था. खेल का नाम था - बीच वाली उँगली. मैं बाकी की तीन उँगलियों और अंगूठे के बीच, अपनी बीच वाली उँगली को ऐसे छिपा लेता था कि मजाल है कि कोई उसे ढूंढ पाए !

तुम लडकी हो इसलिए तुम्हें भी लगता था कि तुम खेलों में फिसड्डी ही साबित हो जाओगी. शायद इस वजह से तुम भी घंटों मेरे साथ वही खेल खेला करती थीं. 

एक दिन तुमने बताया कि पिता जी का तबादला हो गया है और तुम शहर छोड़ कर जाने वाली हो. तुमने कहा कि मैं तुम्हें कहीं छिपा लूं. तुम संदूक में फिट नहीं हो पाई, इसलिए मैंने तुम्हें खटिया के नीचे छिपा दिया पर तुम्हारे पिता जी ने उसकी जालीदार निवाड़ में झांककर तुम्हें झट से खोज लिया. 

और तुम चली गईं. 

काश... उस दिन, मैं तुम्हें अपने अंगूठे और बाकी की तीन उँगलियों के बीच छिपा लेता !!

काश !!

इश्क़ क्लीशे हुआ तो क्या

इश्क़ क्लीशे हुआ तो क्या ! फ़रमाया करो 
गालों के तिल पे भी कभी दाँव, लगाया करो 

यूँ तो सबको चाँद सा ही दिखता है चाँद 
कभी प्यार से उसे, 'मामा' बुलाया करो 

चिड़ियों को उड़ता देख यूँ, मायूस होते हो 
तबियत से तुम भी तो बाहें फैलाया करो 

वो बच्ची है बड़ी प्यारी, ज़रा सा रूठ जाती है 
उसे चुपके से आकर के, गुदगुदाया करो !

किवाड़

वो मेरे घर में 
किवाड़ की तरह रहे 
बेडरूम और बैठकी में 
फटकने से, 
डरते-कतराते थे 

मैं चिढ़ता-कुढ़ता रहा 
उनकी चाँय-चाँय 
और ख़ट-पट से 

मेरे माँ-बाप, मगर 

खड़े रहे,
सालों-साल ! 
ना जाने कौन सी 
अनहोनियों को 
घर में घुसने से 
रोकने के वास्ते !

न ग्रीज़िंग मांगते थे, 
न ऑयलिंग 
अपने झुर्रीदार कब्जों के ख़ातिर 

उन्हें कुंडी में रखता था 
मगर जब भी धकेला,
तो वो झट से खोल देते थे 
यूँ अपनी काठ की बाहें !
कि जैसे धूप आने पर 
मचल जाता है सन-फ्लावर !

फ़रमाइश

मिठाई फेंक देता है, कि मिट्टी फांक लेता है 
बच्चा माँ के आँचल में, ये दुनिया झाँक लेता है 

नहीं वो राम की सुनता, न वो अल्लाह को समझे 
जो कह दे माँ, तो चंदा को भी, मामा मान लेता है 

अभी सीखा नहीं चलना, वो घुटनों पर घिसटता है 
मगर जो माँ पुकारे तो, उड़ारी मार लेता है 

वो तिनकों के नशेमन में, छुपी चिड़िया सा लगता है 
वो अपनी माँ के कन्धों पे, यूँ बाहें टांग लेता है 

बड़ी फ़रमाईशे करता है, जुगनू से सितारों तक 
ये सब कुछ दे नहीं पाती, वो सब कुछ मांग लेता है !

गेंद

इश्क़ में तेरे 'गेंद' बनूँ मैं, उछलूँ टप्पे-टप्पे 
सब लुढ़कें हैं 'सुर्री', और मैं कूदूँ चप्पे-चप्पे 
छोटी क्रेज़ी बॉल के जैसे, लेफ़्ट-रैट कटता हूँ 
देख रहे हैं लोग-बाग़, हैराँ-हैराँ, भौंचक्के !

अक्कल दाढ़ !!

'पंख', सिर्फ़
चिड़ियों को ही 
नहीं होते 

'पंख', कभी-कभी 
ऐसे निकल आते हैं 
जैसे, ज़ेबों से 
मूंगफलियाँ !
जैसे, खुजाने से 
बलतोड़ !
या मूतने से 
कुकुरमुत्ता !

पंख उग आते हैं 
बरसात में बिलबिलाते 
चींटे को 
उसे "ततैय्या" बनाने को 

पंख उग आते हैं 
घर में मुश्किलें आने पर 
पापा को 
उन्हें "सुपरमैन" बनाने को 

पंख उग आते हैं 
नीला रिबन बाँधे,
स्कूल जाती, गुड़िया को 
उसे "परी" बनाने को 

पंख उग आते हैं 
आदिवासियों की 
बन्दूक की बैरल को 
उन्हें "माओवादी" बनाने को 

'पंख', सिर्फ़
चिड़ियों को ही 
नहीं होते 

पंख, कुछ इस तरह
निकल आते हैं 
जैसे, मसूढ़ों को चीरकर 
अक्कल दाढ़ !!

स्टैच्यू

इक दफ़ा 

जब, तुमने 
मेरी उंगली थामी थी 
काश ! मैं तुम्हें 
उसी वक़्त 

"स्टैच्यू" कह देता 

और 
हम - तुम 
"तस्वीर" हो जाते 

लकीरों को भी 
मुह चिढ़ाते, 
हम - तुम 

"तक़दीर" हो जाते !

चुईंगम

तुझसे तो, 
तेरा ख़याल अच्छा 

जिसे,
चुईंगम की तरह 
घंटों चबा सकता हूँ !

फोड़ सकता हूँ,
फुला सकता हूँ !

'इसे' मैं थूक भी दूँ तो, 
कभी उंगली, 
कभी हवाई चप्पल,
तो कभी, 
मूछ और होंठ के बीच 

"जोंक" सा चिपक जाता है 

'कमिटमेंट' 
सीखना है तो 
तेरे ख़याल से सीख

ज़िक्र

बड़े दिनों से कोई, इस घर नहीं है आया 
उधर चला गया क्या? इधर नहीं है आया 

उस छोकरी का फ़ौजी, जो जंग पे गया था 
वो धड़ तो आ गया है, पर सर नहीं है आया 

वो पोटली का बाबा, बुढ़ियों के बाल लेकर 
निकला था जो कमाने, शहर, नहीं है आया 

सूरज सुबह उगा था, पूरब की उस नदी से
पानी में घुल गया क्या? नज़र नहीं है आया

फ़तूर

इश्क़ कहिए,
या फ़तूर कहिए
जिसे चाहे, उसका,
क़सूर कहिए

इस मर्तबा


इस मर्तबा
तुम मेरे सपनों में 
पतंग बन कर आना 

हम दोनों पतंगें
कुछ देर गलबहियां डाले
उलझते-ढीलते रहेंगे 

और फिर तुम 
मेरी कन्नी काटकर

मुझे,
उसके मांझे से 
'मुक्त' कर देना 

कुछ देर, आसमान में 
इंगे-उंगे भटक कर 
मैं, पक्का,
तुम्हारी ही बालकनी में 
आ गिरूंगा 

तुम, झट से मुझे 
लूट लेना 

इस मर्तबा

जज़्बा


ये बात 
ख़ासी अजीबो-गरीब है 

कि तुम 
ज़मीन से 'उड़ी' मारकर 
'अपोलो' और 'लूना' से 
चाँद तलक़ भी पहुँच गए 

लेकिन,

एक छाती लाँघ के, 
दूसरी छाती, 
उसके दिल तलक़ 
पहुँचने के मिशन में 

कभी तुम्हारा 'ईंधन' 
कम पड़ गया 
और कभी तुम्हारा 
"जज़्बा"

आईने

आईने, रहने दो

माँ और महबूबा की 
"आँखें" 
काफ़ी हैं 

जो खुद को
देखना हो तो
ज़रा सा झाँक लेता हूँ

झुरझुरी

एक बार फ़िर 

तुम आईं, 
पुरानी शाखों पर 
नए पत्ते की तरह 

और मैं लहलहा उठा 
सर्द रात में 
कांपते बदन की 
झुरझुरी की तरह  

एक बार फ़िर  

अल्लाह-हू-हक़

मुझे डिट्टो 
वही वाला 
"अल्लाह" 
ले आ दो,

जो सूफी क़व्वालों की 
क़व्वालियों में 
बसता है 

कोई दूसरा वाला 
अल्लाह 
नइयो-नइयो
लभणा !!