ये निखिल सचान का रफ़ रजिस्टर है....इसमें उस वक़्त की कविताएँ हैं, जब मुझे लिखने का ख़ास सलीका नहीं था और आज की बातें है, जब आज भी मैं सलीका सीख ही रहा हूँ ! काश ता-उम्र सीखता रहूँ और इसी शौक़ में ज़िंदगी गुज़र जाए
Thursday, 9 April 2026
Saturday, 28 March 2026
घर
गाँव का सुकून-घर छोड़कर
मैं छोटे शहर में, किराए के तंग-घर में रहा,
ताकि एक दिन बड़े शहर में
एक बड़ा महल-घर बना सकूँ।
महल-घर बना, लेकिन मैं वहाँ बमुश्किल रह पाया,
क्योंकि उसे बनाने की फ़िक्र में,
दफ़्तर मेरा घर बन चुका था।
पूरी ज़िंदगी दफ़्तर-घर में
मैं एकदिन थककर,
बस चैन से मर जाने के लिए।
बेवक़ूफ़ इंसान,
वापस अपने पहले घर में लौट आने के लिए।
Sunday, 22 March 2026
मैं एक दिन चला जाऊँगा.
मैं एक दिन चला जाऊँगा.
और जब मुझे सारी दुनिया में मुझे
ढूँढकर थक जाओगी तुम
तब मुझे ढूँढना तुम,
मेरी पुरानी कविताओं में.
उसके शब्दों में नहीं,
उसके अर्थ में भी नहीं.
मैं मिलूँगा तुम्हें,
कविता जहाँ ख़त्म हो रही होगी,
ठीक उसके बाद वाले लंबे मौन में.
मौन, जो बिजली के तरह तुम्हें झिंझोड़ देगा
और फिर मैं लहलहा कर उठ खड़ा हूँगा
तुम्हारे रोम-रोम में
बारिश के बाद खिली फसल की तरह
प्रेम में पड़े लोग
प्रेम में पड़े लोग
उन चीटियों जैसे होते हैं
जो ख़ुद से हज़ार गुना भारी बोझ
सिर पर ढोती फिरती हैं
और अनजाने ही, आ जाती हैं
किसी न किसी के, पाँव के नीचे
प्रेम में पड़े लोग उन चीटियों जैसे होते हैं
जो मिठास की खोज में
ज़िंदगी भर एक क़तार में चलती रहती हैं
पूरी ज़िंदगी, बस एक घर बसाने के लिए
वो शक्कर के दाने जोड़ते रहते हैं
लेकिन घर बसने के पहले ही
मसल दिए जाते हैं, प्रेम में पड़े लोग
इन पागल चीटियों की ही तरह
Monday, 9 March 2026
मुझे पसंद थी वो लड़की
मुझे पसंद थी वो लड़की,
जो तोहफ़े में गुलाब और झुमके नहीं मांगती थी
वो खुद खरीद लाती थी जेब वाली जींस
और कैनवास के जूते
जूते उसके लिए क्रांति का बिगुल थे,
उन मर्दों के खिलाफ
जिन्होंने औरतों के लिए बनाई
ऊँची हील वाली सैंडिलें,
ताकि वो लंगड़ाते हुए कहीं वक़्त पर न पहुँच सकें
और भाग भी न पाएँ, कभी घर छोड़कर
मुझे पसंद थी वो लड़की,
जिसने जेब वाली जीन्स पहनकर
उन मर्दों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूका
जिन्होंने महिलाओं के लिए बनाई
बिना जेब की उलझी हुई साड़ियाँ और सलवारें
ताकि वो भूलती-खोजती फिरें
चाबियाँ, फोन और लिपस्टिक,
और मर्द ठहाके लेकर उन्हें कह सकें
भुलक्कड़ और लेट लतीफ़
मुझे पसंद थी वो लड़की,
जो इतनी मासूम थी,
कि बस जूते और जींस पहन कर
वो ऐसी क्रांति का ख़्वाब देखती थी
जो हम मर्द - बंदूक और बारूद से
हज़ारों साल में नहीं कर पाए
Sunday, 22 February 2026
हाथ थाम लेना
तो इल्म हुआ, किसी ने पहली दफ़ा,
हाथ थाम लिया है
और समझ आया
कि हाथ पकड़ने से,
कितना अलग होता है
हाथ थाम लेना
थम जाती है इस दुनिया को ज़िंदा फूँक देने की इच्छा
थम जाती है इस सिरफिरे दिमाग की बड़बड़
थम जाता है तमाशा, इर्द-गिर्द का
हाथ थाम लेने से
थम जाती है अपनी धुरी पर नाचती पृथ्वी
थम जाता है वक़्त, साँस, धड़कन
थम जाती है ख़ुद से, ख़ुद की लड़ाई
और न जाने कितने विश्व युद्ध
थम जाता है इतना कुछ
इस पागल दुनिया को
बचाया जा सकता है
Saturday, 3 January 2026
वो सहमा हुआ सा लड़का,
दबे सुर में “यस सर, जी सर” मिमियाता रहता है,
एक वक़्त था जब वो आधी दुनिया को
वो सहमा हुआ सा लड़का जो आज
घर से दफ़्तर के अलावा, कहीं और नहीं जाता
एक वक़्त था जब वो ऊँची साइकिल पर सवार होकर
एक साँस में नाप लेता था पूरी धरती
और दूसरी में नाप लेता था सारा आकाश।
वो सहमा हुआ सा लड़का जो आज
बस सर झुकाकर लैपटॉप में नज़रें गड़ाए रहता है
एक वक़्त था जब वो नज़र उठाकर, घूरकर,
अपने अंगूठे और उँगली के बीच
सौ-सौ सूरज बुझा देता था।
वो सहमा हुआ सा लड़का,
जिसके सभी ख़्वाब, सूख कर
आँख में काई की तरह जम चुके हैं
एक वक़्त था जब दर्जन भर ख़्वाबों से
उसकी आँखें पिचोला झील की तरह चमकती थीं।
मैं मरने से पहले, बस देखना चाहता हूँ ये मंज़र
कि वो सहमा हुआ सा लड़का,
दुनिया को जूते की नोक पर रखने वाले उस बच्चे से,
गले मिलकर, लिपटकर,
छक कर रो ले
और फिर दोनों मिलकर, राख कर दें
इस काँच के मनहूस दफ़्तर को
जहाँ वो बस मिमियाता रहता है
यस सर, जी सर, यस सर।
यस सर, जी सर, यस सर।
Monday, 22 December 2025
प्रेम
बादलों ने बारिश को रोकने की ज़िद,कभी नहीं की
उन्होंने उसे झूमकर बरसने के लिए, जाने दिया
क्योंकि वो जानते थे, कि,
प्रेम, किसी को रोकने की ज़िद से ज़्यादा,
उसे जाने देने के साहस का नाम है।
बादलों को भुला कर,
बारिश ने ज़मीन को गले लगाया,
और उससे, टूटकर, बिखरकर, प्रेम किया
लेकिन जब अपना वज़ूद खोकर, भाप बनकर,
उसने बादलों को फिर से मुड़ कर देखा
तो बादलों ने उसे, उतने ही स्नेह से स्वीकार किया।
प्रेम, लौट आने के बाद, सब भूलकर
फिर से स्वीकार लेने का नाम है।
Wednesday, 10 December 2025
मछलियाँ
टूट कर किए गए प्यार की।
Tuesday, 7 March 2023
त्रासदी
वैसे तो दुनिया मे तमाम त्रासदियाँ हुईं
न जाने कितनी ही स्पीशीज़ लुप्त हो गईं
कितने ही युद्ध लड़े गए
मुगल, मंगोल आए, और सब कछ रौंद कर चले भी गए
लेकिन मेरे जीवन में सबसे बड़ी त्रासदी तब हुई,
जब मुझे इल्म हुआ कि मैं और तुम सयाने हो गए !!
जब हमने ये जान लिया कि किताबों मे दबाकर रखे गए
गौरैया के टूटे, लंगड़े पंखों से
एक दिन नई गौरैया नही निकल आती
जब हमने जाना कि आँख से टूटी पलक की काली कतरन
हथेली पर रखके, छाती भरकर, फूक देने से
हम तुम हमेशा के लिए एक दूसरे के नही हो जाएँगे
हमने जाना कि भूख इंसान से पहले
उसके भीतर प्यार का एक एक कतरा मार देती है
इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि एक दिन तुम सयानी हो गई
और तुम्हारी देखा देखी, मैं भी हो गया सयाना
हमें जादू-वादू बेमानी लगने लगा
और हम सपने देखने से पहली, हर बार कहने लगे -
"ऐसा सचमुच मे कहाँ होता है यार"
एक वक्त था जब तुम रोज़ाना, शिमला भाग कर
वहां किसी खाई में बस जाने का मास्टर प्लान बनाती थी
और मैं उसके लिए जोड़ता था पचास के सीले हुए नोट
जब मैं रात-रात जाग कर लिखता था तुम्हारे लिए कविताएं
और एक छोटा सा कमरा, हमें चार बेडरूम किचेन के
आलीशान घरों से कई गुना बड़ा लगता था
जब सी-व्यू-अपार्टमेंट, न तुम्हे चाहिए था न और मुझे
क्योंकि मेरे घर में थी, तुम्हारे आँखों की समूची डल झील
और तुम्हारे पास था मेरी बाहों भर नीला आकाश
इतिहास की किताबों मे जब इतिहासकार
दर्ज़ कर रहे होंगे सभी त्रासदियाँ
क्या कोई दर्ज़ करेगा हमारे सयाने हो जाने की त्रासदी?
क्या किसी किताब में खून से लिखेंगे ये इतिहासकार?
कि एक तूफ़ान से भी तेज बहने वाली ज़िद्दी लड़की
सिमटकर बंद हो गई, समझदारी की बौनी डिबिया मे
और दुनिया को जूते की नोक पर रखने वाला बेखौफ़ लड़का
'यस सर - यस सर' करके, बाकी की ज़िंदगी
मिमियाता रहा काँच के खौफनाक दफ्तर में !!
Sunday, 4 October 2020
दलितों की लडकियां
वो इतनी अछूत हैं कि कुआँ छू दें तो गाँव
कुएँ का पानी नहीं पीता
वो कुएँ से दूर खड़ी, मुह में आँचल दाबे
इंतज़ार करती रहती हैं
कि ऊंची जात वाले पानी भर ले जाएँ
और उनका पानी पवित्र बना रहे
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि ऊँची जात वाले
उनके गले में दांत गड़ाकर
उनका बलात्कार न कर पाएं
वो इतनी अछूत हैं कि उनकी चिता को
उनके परिवार वाले भी छू न पाए
वो इतनी अछूत हैं कि उनके शव को
उनकी माँ आखिरी बार देख भी न पाई
वो जलती रहीं रात के अँधेरे में
और सूरज की रौशनी भी छू न पाई
उनकी चिता को
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि ऊँची जात वालों ने
उन्हें छूने की तलब में
उनकी रीढ़ की हड्डी तोड़ डाली
वो इतनी अछूत हैं कि उनके गाँव में
कोई नहीं घुस सकता
न मीडिया, न कैमरा, न सत्ता
न बिना इजाज़त हवा, न पत्ता
वो इतनी अछूत हैं उनका गाँव
किले में बदल दिया गया है
और पूरी दुनिया से दिया गया है काट
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि ऊँची जात वाले
उनकी जबान काट देते हैं
वो इतनी अछूत हैं कि हमारे शहर
आज तक उनके गाँव नहीं पहुंचे
न ही पहुँची सड़क और बिजली
न ही पहुंचा विकास उनके पास
न आँख पर पट्टी वाला कानून
साथ में डेमोक्रेसी लेकर
वो इतनी अछूत हैं
लेकिन इतनी भी नहीं कि भारत में
हर दिन दस दलित लड़कियों का
बलात्कार न हो सके
वो दलितों की लडकियां
यहाँ इतनी अछूत हैं
कि अपनी कटी जबान और टूटी रीढ़ की हड्डी लेकर
वो चली गईं हैं, ना उम्मीद,
सब छोड़ कर
अपना गाँव, अपना दुआर
अपना बाबुल, अपने खेत
अपनी सहेलियां, अपनी गुड़ियाँ
अपने त्यौहार, अपने झूले
अपना देश, अपना संविधान
छोड़कर, वहाँ,
जहाँ कोई उनसे
नहीं पूछेगा उनकी जात
और नहीं पूछेगा कि वो क्या लगाती हैं
अपने नाम के आगे
उन्हें स्वर्ग नहीं भोगना है
उन्हें वो नर्क भी चलेगा
जहाँ के कुँए से सब साथ पानी भर सकें
Sunday, 22 December 2019
मुसलमानों का मोहल्ला
कौमी एकता की बातें
बस कहने में अच्छी लगती हैं.
कहता था, कि तुम कभी
मुसलमानों के मोहल्ले में
अकेले गए हो ?
कभी जाकर देखो. डर लगता है.
हालांकि उसे शाहरुख़ खान बहुत पसंद था
उसके गालों में घुलता डिम्पल
और उसकी दीवाली की रिलीज़ हुई फ़िल्में भी
दिलीप कुमार यूसुफ़ है, वो नहीं जानता था
उसकी फिल्में भी वो शिद्दत से देखता था
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
और सलमान की ईदी का
गर जो ब्लैक में भी टिकट मिले
तो सीटियाँ मार कर देख आता था
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
विज्ञान में उसकी दिलचस्पी इतनी कि
कहता था कि अब्दुल कलाम की तरह
मैं एक वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ
और देश का मान बढ़ाना चाहता हूँ
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
ख़ासकर मोहोम्मद अज़हरुद्दीन की कलाई का
ज़हीर खान और इरफ़ान पठान की लहराती हुए गेंदों का
कहता था कि ये तीनों जादूगर हैं
ये खेल जाएं तो हम हारें कभी न
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
उन्हें वो ब्लैक एंड व्हाईट में देखना चाहता था
वो मुरीद था वहीदा रहमान की मुस्कान का
और परवीन बाबी की आशनाई का
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
कहत था कि ख़ुदा बसता है रफ़ी साहब के गले में
वो रफ़ी का नाम कान पर हाथ लगाकर ही लेता था
और नाम के आगे हमेशा लगाता था साहब
अगर वो साहिर के लिखे गाने गा दें
तो ख़ुशी से रो लेने का मन करता था उसका
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
सारे जहाँ से अच्छा गाता था
कहता था कि अगर
गीत पर बिस्मिल्ला खान की शहनाई हो
और ज़ाकिर हुसैन का तबला
तो क्या ही कहने !
वो उनसे नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
ग़ालिब की ग़ज़ल कहता
फैज़ के चंद शेर भेजता
उन्ही उधार के उर्दू शेरों पर पर मिटी उसकी महबूबा
जो आज उसकी पत्नी है
वो इन सब शायरों से नहीं डरता था
बस मुसलमानों से डरता था
बड़ा भोला भी
वो अनजाने ही हर मुसलमान से
करता था इतना प्यार
मुसलमानों से डरता था
वो मुसलमानों के देश में रहता था
ख़ुशी ख़ुशी, मोहोब्बत से
और मुसलमानों के न जाने कौन से मोहल्ले में
अकेले जाने से डरता था
वो भगवान् के बनाए मुसलमानों से नहीं डरता था
शायद वो डरता था, तो
सियासत, अख़बार और चुनाव के बनाए
उन काल्पनिक मुसलमानों से
जो कल्पना में तो बड़े डरावने थे
लेकिन असलियत में ईद की सेंवईयों से जादा मीठे थे
Thursday, 19 December 2019
केलाइडोस्कोप
और उनकी लाठियों के संगीत में
लय मिलाकर जन-गण-मन का गीत गाना
तुम रंगीन कंचे भरकर, उनकी तोपों को
सुन्दर केलाइडोस्कोप बना देना
कि उसमे वो ख़ुद झांकें तो उन्हें
बारूद की जगह प्रेम के हज़ार रंग दिखें
देखना ! जो तुम मुस्कुरा कर
कस कर गले लगाओगे
तो वो भी, वर्दी उतारकर
बुद्ध हो जाएँगे
Tuesday, 10 December 2019
घृणा और प्रेम
प्रेम करते, मुस्कुराते
सबको बाहों में भरते, चूमते
किलकारी मार कर दौड़ते
आकर किसी की भी गोद में बैठ जाते
और उसकी छोटी ऊँगली पकड़ कर
किसी के साथ भी चल देते, मुस्कुराते
वो ऊँगली का रंग नहीं देखते थे
न ही पूछते थे ऊँगली की जात और मज़हब
क्योंकि उन्हें उंगली की ऊष्मा पसंद थी
और पसंद था उनकी मुट्ठी में एक अदद ऊँगली का होना
वो बच्चे सब कुछ करते थे
बस किसी से घृणा नहीं करते थे
क्योंकि कोई भी बच्चा
जन्म से घृणा करना नहीं सीखता
वो जन्मता है बस प्रेम के साथ
प्रेम एक जन्मजात गुण है
और घृणा मानव निर्मित है
घृणा हम यहीं सीखते हैं
और यहीं छोड़ कर चले भी जाते हैं
क्योंकि उसका भार
चार अदद कंधे और पूरा मोहल्ला मिललकर भी
अर्थी पर नहीं उठा पाता
जब हम मरते हैं तो घृणा से हमारी भौहें तनी नहीं होतीं
हमारे माथे पर क्रोध के बल की रेखाएं नहीं होतीं
हमारे आँखें गुस्से से लाल नहीं होतीं
जब हम मरते हैं
तो बस हमारी मुट्ठी बंध जाती है
उसी छोटी ऊँगली की उष्मा की आस में
हम घृणा यहीं छोड़ कर
चले जाते हैं बौद्ध होकर
एक शांत, सौम्य, प्रेम में पड़ा चेहरा लेकर
वहां,
जहाँ से हमें भेजा गया था,
प्रेम करने. हंसने. खिलखिलाने.
Saturday, 2 December 2017
कॉकरोच और प्रेम पे पड़े लोग
औंधे मुह पलट देना
और उन्हें बिलबिलाते देखना
बड़ा सुकून देता है
देखकर
कि प्रेम में पड़े लोगों जितना
बेबस जानवर
कोई और भी होता है
प्रेम पे पड़े लोग
कभी नहीं मरते
वो सह जाते हैं
बड़े से बड़ा नयूक्लियर अटैक
और उम्मीद की अफ़ीम खाकर
जी जाते हैं, जैसे तैसे, ये ज़िंदगी
बिलबिलाते
कुलबुलाते
तिलमिलाते
छटपटाते
Tuesday, 20 June 2017
Friday, 16 June 2017
तुम आ जाओ
कि जैसे छुट्टी की घंटी बजे
और बच्चें ख़ुशी से भागते आएं
मटकते, खिलिखाते, किलकिलाते, उतराते
पैंट की बद्धी, बुस्शर्ट, बस्ता संभाले
स्कूल की हज़ार गप्पी बात लिए,
माँ के गले लग जाएं
कि जैसे सालों की देरी के बाद
अदालत का फ़ैसला आए
और किसी सूदखोर से लड़-झगड़कर
एक बेचारे सच्चे आदमी को
जनम भर की फँसी हुई पूँजी, ज़मीन
असल और सूद के साथ मिल जाए
कि जैसे पहाड़ों में सीना फुलाकर
कोई महबूब का नाम चिल्लाए
उसकी आवाज़ गूंज कर लौट आए
और सब ओर से उस पर बे-इन्तहा बरसे
बिखरे, टूटे, छिटके, चिपटे
और उससे कस के लिपट जाए
कि जैसे आँगन में बिन-पूछे-बुलाए
खोई हुई गौरैया चली आए
अपनी चोंच से गर्दन काढ़े, तिनका खाए,
साँस भरे और ऊन का गुल्ला हो जाए
बुद्धू जैसी घंटों घूरे
चूं-चूं कर के बोले-बताए
कि जैसे किसी को बे-मौसम बुखार आए
और देह के रोम-रोम में समां जाए
उसे तपाए, तोड़े, कपाए, सताए
माथे तक चढ़ जाए
दवा, डाक्टर, जंतर-तंतर, होमियो-एलो
सबको धता बताए
कि जैसे होली में गाँव के घर-घर
‘जोगीरा-सा-रा' गाती
टोली में झूमती फ़ाग आए
भांग, अबीर, मंजीरा, ढोलक
झांझर, गुझिया, कान्हा, राधा,
पंचम सुर में धैवत गाए
जैसे किसान के खेत में मूसलाधार बारिश आए
मजदूर की आँख में नीद पसर आए
सरहद से किसी का फ़ौजी आए
मौसम की फसल में बाली आए
बारिश में भुट्टे की महक आए
बच्चे को छुट्टे की खनक आए
सुबहों को सूरज की धनक आए
कि जैसे तुम हर बार
आती हो
और तुम्हारा आना
हिंदी की सबसे ख़ूबसूरत क्रिया
बन जाती है !
Tuesday, 9 May 2017
स्पैरो
बड़े अधिकार से, फुदककर,
आँगन तलक टहल जाती थी
मैं भले कुछ बोलूँ-न-बोलूँ
वो फुदकती रहती थी, यूं कि जैसे,
मेरी बेटियाँ लंगड़ी टांग से स्टापू खेलती थीं
फूल कर ऊन का गुल्ला हो जाती थी
और काढती रहती थी चोंच से गर्दन
कि जैसे कोई बुढ़िया
सलाइयों से बिन रही हो स्कार्फ़ या स्वेटर
धूप बटोरा करता था और उसके साथ अखबार पढ़ा करता
ख़बरें समझ न आने पर वो गर्दन मटकाकर
चेहरे बनाया करती थी
मैं जब नाखून काटता और वो छिटककर उस तरफ़ गिर जाता
तो वो उसे कीड़ा समझकर खाने भी दौड़ती
और मैं उसके बुद्धू बनने पर बे-तहाशा हँसता
अखबार पढने नहीं जा पाया
जिसे ऊँगली से रगड़ दो तो वो हर दफ़ा
वही अख़बार वाली ख़बरें सुना देता था
बच्चे भी आँगन में खेलने नहीं जाते
वो मोबाइल में दिन भर एक खेल खेला करते हैं
मैं ये देखकर सहम गया हूँ कि
उस ऐप वाली चिड़िया की शक्ल
गौरैया से हू-ब-हू मिलती है
और मैं भागकर बच्चों से पूछता हूँ -
“ये वही गौरैया है क्या” ?
मगर वो ध्यान नहीं देते
और हर एक स्वाइप के साथ
उनके मोबाइल की स्क्रीन पर कुछ ‘एंग्री बर्ड्स'
दिन भर सर पटकती रहती हैं
और यकायक ऐसे ग़ायब हो जाती हैं, कि जैसे
वो कभी थी ही नहीं !!
Thursday, 30 March 2017
बम्बई
हरदम, दर बदर
फिर भी न हाँफता,
ख़ुदा न खाँसता,
दौड़ता रहता है, यहाँ हर रास्ता,
गलियों को चीरकर.
छूट गई हो तमंचों से गोलियां
या गेंदों के पीछे बच्चे
जो चले जाएँगे फ़लक तक,
ग़र जो रोके नहीं गए, पुकार कर.
आदमी से कंधे रगड़कर, छीलकर
फिर भी कोई पीछे नहीं देखता
बस बुहार देता हैं कन्धा
शर्ट से धूल झाड़ कर.
कि जैसे सोना कोई अपशकुन हो
कहते हैं कि ये शहर
सदियों से नहीं है सोया,
यहाँ भटकते हैं शिवाजी
म्यान में तलवार लेकर.
इतनी ऊंची इमारतें, इतनी जल्दी
कुछ यूँ बना देते हैं
कि जैसे पिट्ठू खेलते वक़्त
हम बना देते थे फटाफट
पत्थरों के ऊंचे टावर.
लम्बोर्गनी और फरारियां हैं
जो फ़रार हैं कब से,
फिर भी बस रेंग ही पाती हैं
किसी केंचुए की तरह
लम्बे ट्रैफिक जामों में फंसकर.
तुम भी हैरान हो जाओगी,
देखकर, कि यहाँ सब लोग
जल्दी में हैं, इतना
फिर भी समय पर
कोई, नहीं पहुँचता, यूँ भागकर.
इस क़दर,
फिर भी, इक ज़माने से
कहीं भी तो पहुँच नहीं रहा है.
कि ये जितना चलता-बढ़ता है,
उसे उतने ही क़दम पीछे
धकेल देता है, समंदर
लहरों के झाड़ू से झाड़कर.
जो रात भर मिलता था
तुम्हारी बाहों में
कि जब रुक जाता था सब कुछ
तुम्हारी गोदी में लेटकर
कि कभी न रुकने वाली
बम्बई में भी
मैं
रुक
गया
हूँ
तुमको
देखकर
ख़ुशी से
चौंक कर
Saturday, 8 October 2016
बकेट लिस्ट
अपनी बकेट लिस्ट
टिक करते हुए,
मैं दुनिया के सात अजूबे
देखना. नहीं चाहता.
न ही यूरोप के सुन्दर देश,
न ही जंगल, नदियाँ, पहाड़.
न इमारतें, मोन्यूमेंट, महल
पेंटिंग्स, स्कल्पचर या पिरामिड
अपने आख़िरी दिनों में
मैं बच्चों के किसी स्कूल जाकर
रोज़ाना तय समय से पहले
छुट्टी की लम्बी घंटी बजा दूं
और स्कूल के बच्चों को
बे-इन्तहा ख़ुशी से दौड़ते,
कूदते, फाँदते, खिलखिलाते
तब तक देखता रहूँ,
जब तक कि हो न जाएँ वो,
नज़रों से ओझल