Friday, 16 June 2017

तुम आ जाओ

तुम आ जाओ,
कि जैसे छुट्टी की घंटी बजे
और बच्चें ख़ुशी से भागते आएं 
 मटकते, खिलिखाते, किलकिलाते, उतराते
पैंट की बद्धी, बुस्शर्ट, बस्ता संभाले
स्कूल की हज़ार गप्पी बात लिए,
माँ के गले लग जाएं
तुम आ जाओ,
कि जैसे सालों की देरी के बाद
अदालत का फ़ैसला आए
और किसी सूदखोर से लड़-झगड़कर
एक बेचारे सच्चे आदमी को
 जनम भर की फँसी हुई पूँजी, ज़मीन
 असल और सूद के साथ मिल जाए
तुम आ जाओ
कि जैसे पहाड़ों में सीना फुलाकर
कोई महबूब का नाम चिल्लाए
उसकी आवाज़ गूंज कर लौट आए
और सब ओर से उस पर बे-इन्तहा बरसे
बिखरे, टूटे, छिटके, चिपटे
और उससे कस के लिपट जाए
तुम आ जाओ
कि जैसे आँगन में बिन-पूछे-बुलाए
खोई हुई गौरैया चली आए
अपनी चोंच से गर्दन काढ़े, तिनका खाए,
साँस भरे और ऊन का गुल्ला हो जाए
बुद्धू जैसी घंटों घूरे
चूं-चूं कर के बोले-बताए
तुम आ जाओ
कि जैसे किसी को बे-मौसम बुखार आए
और देह के रोम-रोम में समां जाए
उसे तपाए, तोड़े, कपाए, सताए
माथे तक चढ़ जाए
दवा, डाक्टर, जंतर-तंतर, होमियो-एलो
सबको धता बताए
तुम आ जाओ
कि जैसे होली में गाँव के घर-घर
‘जोगीरा-सा-रा' गाती
टोली में झूमती फ़ाग आए
 भांग, अबीर, मंजीरा, ढोलक
झांझर, गुझिया, कान्हा, राधा,
पंचम सुर में धैवत गाए
तुम आ जाओ
जैसे किसान के खेत में मूसलाधार बारिश आए
मजदूर की आँख में नीद पसर आए
सरहद से किसी का फ़ौजी आए
मौसम की फसल में बाली आए
बारिश में भुट्टे की महक आए
बच्चे को छुट्टे की खनक आए
सुबहों को सूरज की धनक आए
तुम आ जाओ
कि जैसे तुम हर बार
आती हो
और तुम्हारा आना
हिंदी की सबसे ख़ूबसूरत क्रिया
बन जाती है !

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