ये निखिल सचान का रफ़ रजिस्टर है....इसमें उस वक़्त की कविताएँ हैं, जब मुझे लिखने का ख़ास सलीका नहीं था और आज की बातें है, जब आज भी मैं सलीका सीख ही रहा हूँ ! काश ता-उम्र सीखता रहूँ और इसी शौक़ में ज़िंदगी गुज़र जाए
Monday, 22 December 2025
प्रेम
बादलों ने बारिश को रोकने की ज़िद,कभी नहीं की
उन्होंने उसे झूमकर बरसने के लिए, जाने दिया
क्योंकि वो जानते थे, कि,
प्रेम, किसी को रोकने की ज़िद से ज़्यादा,
उसे जाने देने के साहस का नाम है।
बादलों को भुला कर,
बारिश ने ज़मीन को गले लगाया,
और उससे, टूटकर, बिखरकर, प्रेम किया
लेकिन जब अपना वज़ूद खोकर, भाप बनकर,
उसने बादलों को फिर से मुड़ कर देखा
तो बादलों ने उसे, उतने ही स्नेह से स्वीकार किया।
प्रेम, लौट आने के बाद, सब भूलकर
फिर से स्वीकार लेने का नाम है।
Wednesday, 10 December 2025
मछलियाँ
मछलियाँ, पानी से ता-उम्र प्यार करती हैं
ये जानते हुए भी, कि कल जब मछुआरा आएगा
और जाल फेंकेगा,
तो जाल से निकल भागेगा पानी
और पानी के बिना,
तड़पती, बिलखती, दम तोड़ती
पानी की आस में।
मछलियाँ पानी से ता-उम्र प्यार करती हैं
ये जानते हुए भी, कि पानी उनके बिना भी
स्वच्छंद बहता रहेगा,
मछलियों के साथ भी,
और मछलियों के बाद भी।
मछलियाँ फिर भी
ता-उम्र प्यार करती हैं, पानी से
ये जानते हुए भी, कि पानी
मछलियों की लाशों के साथ भी
उतनी ही उमंग से बहता रहेगा।
मछलियाँ फिर भी
ता-उम्र प्यार करती हैं, पानी से
ये जानते हुए भी कि
इतना प्यार जानलेवा होता है।
इस दुनिया को
पानी से ज़्यादा ज़रूरत है
बुद्धू मछलियों की
और बुद्धू मछलियों की तरह
टूट कर किए गए प्यार की।
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