ये निखिल सचान का रफ़ रजिस्टर है....इसमें उस वक़्त की कविताएँ हैं, जब मुझे लिखने का ख़ास सलीका नहीं था और आज की बातें है, जब आज भी मैं सलीका सीख ही रहा हूँ ! काश ता-उम्र सीखता रहूँ और इसी शौक़ में ज़िंदगी गुज़र जाए
Monday, 22 December 2025
प्रेम
बादलों ने बारिश को रोकने की ज़िद,कभी नहीं की
उन्होंने उसे झूमकर बरसने के लिए, जाने दिया
क्योंकि वो जानते थे, कि,
प्रेम, किसी को रोकने की ज़िद से ज़्यादा,
उसे जाने देने के साहस का नाम है।
बादलों को भुला कर,
बारिश ने ज़मीन को गले लगाया,
और उससे, टूटकर, बिखरकर, प्रेम किया
लेकिन जब अपना वज़ूद खोकर, भाप बनकर,
उसने बादलों को फिर से मुड़ कर देखा
तो बादलों ने उसे, उतने ही स्नेह से स्वीकार किया।
प्रेम, लौट आने के बाद, सब भूलकर
फिर से स्वीकार लेने का नाम है।
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