ये निखिल सचान का रफ़ रजिस्टर है....इसमें उस वक़्त की कविताएँ हैं, जब मुझे लिखने का ख़ास सलीका नहीं था और आज की बातें है, जब आज भी मैं सलीका सीख ही रहा हूँ !
काश ता-उम्र सीखता रहूँ और इसी शौक़ में ज़िंदगी गुज़र जाए
Wednesday, 18 September 2013
दो दूनी चार
दो और दो को जोड़, चार समझ बैठे दिल्लगी को तुम भी, प्यार समझ बैठे
हर किसी को हो इश्क़, कहाँ ऐसी किस्मत ज़रा सी हरारत को, बुख़ार समझ बैठे
waah sir bahut achhaaa!!
ReplyDeleteLaajawab
bade din baad kisi ke blog pe shanti se ghant bhar gujara hai. Dhanywaad :)
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