Friday, 30 August 2013

एक गांव मे ताज़ा बचपन

एक गांव में ताज़ा बचपन
अमराई पे जुटता था
बौराई चटकी कलियों पर
पागलपन सा लुटता था
 
चिकने पीले ढेले लाकर
उनकी हाट जमाता था
पौआ भर गुड़ से भी ज्यादा
उनका मोल लगाता था
  
नमक लगी रोटी मुट्ठी में
भरकर मजे से खाता था 
फसल चाटती हर टिड्डी को
जमकर डांट लगाता था
 
अमिया की लंगड़ी गुठली से
सीटी मस्त बजाता था 
टीले पे बैठा राजा बन
सब पर हुकुम चलाता था
  
कभी सूर्य तो कभी पवन को
मुर्गा मस्त बनाता था

एक गांव मे ताज़ा बचपन....
अमराई पे जुटता था...

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