Friday, 30 August 2013

मैं ही तो हूं

मुठ्ठी भर घुटता अरमान
बुझी हुई राख सा अभिमान
अखिरी खरीदी हुई सांस
तिरस्कृत सी पड़ी आस

मैं ही तो हूं....

दस जोड़ी वर्षों का व्यर्थ
ठुकराई सी गज़लों का अर्थ
दो कौड़ी के हौसलों का दंश
पुराने फ़टे कागज़ का अन्श
हां ..मैं ही तो हूं...

ज़लील सा करता तेरा वो लतीफ़ा
दाद देते समाज के ठहाकों का वजीफ़ा
हर ज़मात में अखिरी
हर तमाचे में हाज़िरी
मैं ही तो हूं....

एक बेकार सरकारी एहसान
मुर्दा समाज का जलपान
तेरे हर ताने पे मौन
अपने ही प्रतिबिम्ब में 'कौन'

हां... मैं ही तो हूं..

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